सरस सलिल विशेष

पाकिस्तान में पाकिस्तान तहरीके इंसाफ पार्टी के नए नेता ने सत्ता संभाल ली है. 1992 में विश्वकप जीतने वाले इमरान खान ने 22 साल का लंबा सफर राजनीति में अपनी प्रधानमंत्री बनने की इच्छा को पूरा करने के लिए तय किया. इस दौरान कई से शादियों का सेहरा पहना और कितनी औरों के साथ संबंध बनाए पता नहीं पर फिर भी पाकिस्तान की कट्टरपंथी जनता ने इस बार उन्हें जिता दिया है और पुराने नवाज शरीफ व जुल्फीकार भुट्टो के वारिसों को नकार दिया है.

भारत में कहा जा रहा है कि यह वहां की सेना की कृपा से हुआ और सेना ने असल में अपने मुखौटे को सत्ता में बैठाया पर यह निरर्थक सा आरोप है. पाकिस्तान में किसी की भी सरकार बने, सेना को फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह तो वही करेगी जो चाहती है. देश की असली कमान तो वहां सेना के पास ही है.

भारत के लिए इमरान खान कुछ खास साबित होंगे इस की उम्मीद नहीं है. बस फर्क इतना है कि उन के चेहरे से भारत के वे करोड़ों परिचित हैं जो 1992 में उन के दीवाने थे जब उन्होंने क्रिकेट कप जीता था. खेल के मैदान में जीतने वाले से उम्मीद की जा सकती है कि वह राजनीति को खेलों की सी योग्यता की प्लेट पर रख कर देखेगा और अति करने से बचेगा.

पाकिस्तान की स्थिरता भारत के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि यदि किसी गृहयुद्घ में पाकिस्तान फंसता है तो उस का खामियाजा भारत को भुगतना पड़ सकता है. पाकिस्तान का आर्थिक पिछड़ापन भारत के लिए परेशानी भी बन सकता है हालांकि अब तो पाकिस्तान ने सिर्फ अपनी जनता का ध्यान बंटाने के लिए भारत पर आक्रमण नहीं किया है. 1971 के बाद पाकिस्तान को अपनी हैसियत मालूम है.

अब तो वैसे उलटा होता नजर आ रहा है. जो कट्टरता पहले पाकिस्तान में दिखती थी उस पर भारत में खिल्ली उड़ाई जाती है, अब भारत में दिखने लगी है. पाकिस्तान ने पहले एटम बम बना कर अपनी शक्ति दिखा ही दी है और अब चीन के साथ वन रोड योजना का अहम पार्टनर बन कर वह अपने विकास के नए रास्ते भी खोज रहा है. पाकिस्तान में गरीबी है पर फिर भी बहुत गरीब भारत के गरीबों से अच्छे हैं क्योंकि वहां दलित नहीं हैं.

धार्मिक कट्टरपन में भारत पाकिस्तान से अब 2 हाथ आगे जा रहा है और ऐसे में यदि इमरान खान के 2-4 काम भी सही बैठ गए तो काफी कुछ नया हो सकता है. इमरान खान पश्चिम से काफी प्रभावित हैं और भारत विरोधी होते हुए भी उन्हें मालूम है कि पश्चिमी देशों की तरह एक साथ बैठ कर ही समस्याएं सुलझाई जा सकती हैं.

इमरान और सेना के संबंधों के पूर्वाग्रह को छोड़ कर ही भारत को पाकिस्तान से व्यवहार करना होगा और कम से कम नागरिकों के मिलनेजुलने पर लगी बीसियों रोकटोकें समाप्त कर देनी होंगी. उम्मीद करें कि दो कट्टरप्राय देश अब कुछ समझेंगे.

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