सरस सलिल विशेष

उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार नर्सरी से सभी सरकारी स्कूलों में अंगरेजी पढ़ाएगी तो केरल की वामपंथी सरकार निजी व सरकारी सभी स्कूलों में  10वीं तक मलयालम अनिवार्य कर रही है. अपनीअपनी खप्ती सोच पर जो नियम लागू किए जा रहे हैं उन का मातापिता या बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह दोनों सरकारें जानने की भी इच्छुक नहीं हैं. अंगरेजी काम की भाषा है पर यह तो पक्का कर लें कि आखिर कितने लोग सही अंगरेजी पढ़, बोल और लिख पाते हैं? देश के प्राइवेट स्कूलों से निकले ज्यादातर बच्चे भी अंगरेजी में फिसड्डी रहते हैं, क्योंकि उन्हें अंगरेजी का ज्ञान कम ही होता है और रोजमर्रा की भाषा में चूंकि हिंदी व्याकरण का इस्तेमाल होता है, अंगरेजी के शब्दों या छोटे वाक्यों से काम चलाया जाता है.

अंगरेजी पढ़ कर देश का विकास हो जाएगा यह ऐसी ही मूर्खता है जैसे कहना कि संस्कृत पढ़ने से संस्कार सुधर जाएंगे. अमेरिका के अश्वेत, ब्लैक, लैटिनो अंगरेजी पढ़ते और बोलते हैं पर उन का आर्थिक स्तर बहुत कम है. वे अमेरिका की प्रगति का लाभ भी सिर्फ अंगरेजी जान कर न उठा पाए. अंगरेजी का ज्ञान होना विश्व के कितने ही और देशों में काफी फैला है पर विकास वहां न के बराबर है, क्योंकि उन के लिए अंगरेजी ऐसी ही है जैसे उत्तर भारतीयों के लिए हिंदी.

अंगरेजी के अल्फाबेट आना और छोटे वाक्यों का समझ आ जाना गलत नहीं है और अंगरेजी पढ़ाना इस दृष्टि से गलत नहीं है क्योंकि कंप्यूटर की भाषा अंगरेजी ही है और अब इसे कोई हटा नहीं सकता, पर अंगरेजी लिखनेपढ़ने या ज्ञान प्राप्त करने का सहारा नहीं बन सकती.

अगर सरकारें भाषा थोपेंगी तो यह गलत होगा. भाषा के मामले में सरकार को उदार होना चाहिए. हां, भाषा वर्ण या वर्ग व्यवस्था का जरिया न बने, कम से कम सरकार को यह खयाल रखना चाहिए. आज सरकार अधिकांश आदेश अंगरेजी या संस्कृतनिष्ठ हिंदी में जारी करती है जो ज्यादातर के पल्ले नहीं पड़ते. सरकार अंगरेजी विज्ञापनों पर ज्यादा महत्त्व देती है. हिंदी को जो स्थान मिला है वह उत्तर प्रदेश में न तो अंगरेजी पढ़ाने से कम होगा और न ही केरल में मलयालम पढ़ाने से मलयालम का स्थान और ऊंचा हो जाएगा. भाषा विचार और भाव प्रकट करने के लिए होती है और किसी भी एक या 2 भाषाओं पर महारत अच्छी है पर यह फैसला सरकारें न करें.

VIDEO : पीकौक फेदर नेल आर्ट

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