सरस सलिल विशेष

आंकड़ों के अनुसार देश में बेरोजगारी बढ़ रही है. सरकार के इस दावे के बावजूद कि भारत दुनिया की सब से तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है, बेरोजगारी के संकट में कोई कमी नहीं आने वाली. देश में छिपी बेरोजगारी तो बहुत ज्यादा है क्योंकि हमारे यहां 1 कमाए 5 खाएं की परंपरा आज भी चल रही है. बहुत से बेरोजगार आधाअधूरा काम कर के अपनेआप को कमाऊ मान लेते हैं.

बेरोजगारी बढ़ने की जिम्मेदार सरकार ही हो, जरूरी नहीं. किसी भी अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी की जड़ उस की उत्पादकता में होती है. यदि जनसंख्या उत्पादक होगी तो थोड़े से लोग बहुतों के लायक खाना, मकान, कपड़ा जुटा सकते हैं और बाकी व्यर्थ के विलासिता वाले कामों में लग कर अपने को कामकाजी मान सकते हैं, लेकिन यदि उत्पादकता कम होगी तो ज्यादा लोग उसी जमीन या उन्हीं कारखानों में लगेंगे और वे केवल अपने लायक ही सामान पैदा कर सकेंगे या बना सकेंगे.

अमीर देशों में प्रतिव्यक्ति उत्पादकता कृषि, औद्योगिक व सेवा क्षेत्रों में बहुत ज्यादा है और वहां जनसंख्या की 2 से 5 प्रतिशत लोगों की बेरोजगारी भी सरकार के लिए चिंता का विषय होती है. इस के उलट हमारे यहां स्पष्ट व अस्पष्ट बेरोजगारी के आंकडे़ भयावह हैं और गांवों में कृषि पर आधारित बेरोजगारी भी बढ़ रही है. इस का अर्थ है कि देश में ह्यूमन कैपिटल का बेहद नुकसान हो रहा है. देश की अर्थव्यस्था में 10 प्रतिशत से कम योगदान देने वाली कृषि पर 50 प्रतिशत आबादी निर्भर है.

कठिनाई यह है कि देश में सोच है कि यहां रोजगार उसे माना जाता है जहां बिना काम किए पैसा मिले. यहां सरकारी नौकरी ही सर्वोत्तम मानी जाती है चाहे उस का अर्थव्यवस्था के लिए कुछ लाभ न हो. यहां लूट के माल में बंटवारा सर्वोत्तम काम माना जाता है और वही सफल रोजगार माना जाता है जो मुफ्त की खा सके. यह हमारी उस पौराणिक संस्कृति की देन है जिस में काम करने वाले लोग समाज के सब से निम्न हैं और लूटने वाले पंडेपुजारी सब से ऊंचे.

इस समस्या का हल आसान नहीं है क्योंकि मानसिकता बदलने में कई पीढि़यां लगती हैं. अंगरेज हमें बदल नहीं पाए और हमारे नेताओं का तो कहना ही क्या है? वे तो लूट के देवताओं के पुजारी हैं.

VIDEO : फंकी लेपर्ड नेल आर्ट

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