सरस सलिल विशेष

उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में अपने बलबूते पर सरकार बना कर भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष को बड़ा झटका दिया है. लेकिन गोआ और मणिपुर में खरीदफरोख्त कर सरकारें बना कर उस ने अपनी प्रतिष्ठा पर नाहक दाग लगवाया है. रातोंरात विधायकों या छोटे दलों को फुसलाया न जाता तो भी वहां भाजपा की ही सरकारें बनतीं और मामला लोकतांत्रिक ही लगता. जब एक पार्टी की नदी बड़ी बन रही होती है तो छोटे नालों और नदियों से पार्टियां या इक्केदुक्के विधायक अपनेआप उस में आ मिलते हैं. कांग्रेस में टूट का इंतजार कर भाजपा आराम से सरकार बना सकती थी. उत्तराखंड में भाजपा एक बार ऐसी गलती कर चुकी है जिस से उस की किरकिरी हुई थी. पर उस ने बाद में समझौता कर लिया था. अब, उस का अच्छा परिणाम मिला.

भारतीय जनता पार्टी की आंधी अब उस तेजी से बढ़ रही है कि दूसरे दल उस के साथ बहने को ही सही समझेंगे. देश में कुछ साल एक ही पार्टी का राज रहेगा, यह पक्का है. 60, 70 व 80 के दशकों में जो बुद्धिजीवी गैरकांग्रेसवाद का झंडा उठाते थे, उन्हें अब गैरभाजपावाद के झंडे को उठाने का मौका मिल रहा है. राजनीति में यह चलता है और दुनिया के सब देशों में ऐसा होता रहता है.

छोटे राज्यों को हड़पने की कोशिश में भाजपा ने संदेश दिया है कि वह किसी भी कीमत पर एकछत्र राज चाहती है. हालांकि, यह नीति बहुत कामयाब नहीं रहती क्योंकि एकछत्र राज में दंभ और निरंकुशता दिमाग पर हावी हो जाती है. फिर गुस्सा कहीं, किसी और रूप में फूटता है, तब उसे संभालना कठिन हो जाता है जैसा इंदिरा गांधी के साथ 1973-1974 में होने लगा था.