सरस सलिल विशेष

जैसेजैसे भारतीय जनता पार्टी की पहुंच केंद्र के बाद राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों में हो रही है, अलग बोलने की स्वतंत्रता और सामाजिक सुधारों की बातों का स्वर धीमा होता जा रहा है. भारतीय जनता पार्टी की जीत के पीछे कट्टर धर्मवादियों का लगातार व मेहनती काम है जो वे धर्म और धर्म से पैदा होने वाले पैसों व पावर के लिए करते हैं. दूसरे दल अपने कार्यकर्ताओं को राजनीतिक लाभ तो दिला सकते हैं पर उन की हर गली, सड़क पर पैसा बनाने की धर्म की फैक्टरियां नहीं हैं जिन में वे अपने कर्मठ कार्यकर्ताओं को खपा सकें.

ओडिशा और महाराष्ट्र के स्थानीय चुनावों में भाजपा के अच्छे प्रदर्शन का मुख्य कारण है ही यह कि उस के कार्यकर्ता पूरे साल न केवल खुद लगे रहते हैं, सैकड़ों आमजनों को जोड़े भी रखते हैं. प्रभातफेरी, अखंड जागरण, स्वामी का प्रवचन, योग शिविर, अमरनाथ यात्रा, कुंभ स्नान, रामायणपाठ जैसे अनेक कार्यक्रम करते रहते हैं जिन के लिए उन्हें आसानी से चंदा मिल जाता है. और बड़ी बात यह है कि युवाओं, औरतों व खाली बैठे आदमियों को कुछ करने का मौका मिल जाता है.

दूसरी पार्टियों के पास अपने कार्यकर्ताओं को बांधे रखने के लिए कुछ नहीं होता. सोशल मीडिया में जितने भी संदेश धर्मसम्मत होते हैं, उन्हें तैयार करने वाले वे कट्टर ही होते हैं जो सोचते हैं कि ज्ञान की अंतिम सीमाएं तो धर्मग्रंथों में आ चुकी हैं.

इसलामी या ईसाई कट्टरपन भी इसी तरह चला. ईसाइयों का कट्टरपन आज फिर अमेरिका में उभर रहा है और इसलामी कट्टरपन तो अपने देशों को भी जलाने में लगा है. उस के खिलाफ कोई न बोले, यह हर कट्टर चाहता है और चूंकि उस के पास भीड़ होती है, वह यह आसानी से करा सकता है.

दिल्ली के रामजस कालेज में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के उदारवादी छात्र अपनी बात न कह सकें, इस के लिए कट्टरवादी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने जम कर हंगामा किया. सोच पर पहरे की यह पहली जरूरत है. किसी को दूसरी तरह का विचार ही न रखने दो, समाज का एक वर्ग यह हमेशा चाहता है चाहे वह धर्म का अनुयायी हो या किसी खास राज्य का या किसी वाद का.

विचारों पर प्रतिबंध अब दिखने लगा है. धीरेधीरे समाजसुधार की बातों पर अंकुश लगने लगा है. पहरावा भी एक तरह का थोपा जा रहा है. ‘पर्व हमारे मनेंगे, तुम्हारे नहीं’ की भावना तेज हो रही है.

कांग्रेस भी बहुत उदार नहीं थी. फिर भी उस पर अंबेडकर, नेहरू जैसों का असर था जो असहमति के अधिकार को विकास का मूल मंत्र मानते थे. आज, सब से कहा जा रहा है, मिल कर बोलो, ‘‘जय … की.’’