सरस सलिल विशेष

नोटबंदी का फरमान जारी हुए 100 से ज्यादा दिन गुजर चुके हैं, पर न तो देश में सोना बरसा है और न ही चौराहे के पुलिस वाले ने अपना हफ्ता लेना बंद किया है. देशभर में काले धन की कमाई, बेईमानी, आतंकवाद, नकली नोटों का कारोबार कोई कम नहीं हुआ दिख रहा. जो दिख रहा है, वह यह है कि गरीब आदमी अमीरों को मारने की कोशिश में मारा गया है. भारतीय जनता पार्टी के पंडों की अगुआई में फौज ने जम कर नारे लगाए हैं कि लाइनों में लग कर गरीबों ने अमीरों की अक्ल दुरुस्त की है, पर जरा सी आंख खोल कर देखें, तो न सड़कों पर गाडि़यों की कमी हुई है, न बडे़ बाजारों में भीड़ कम हुई?है और न ही शादियों का रंग फीका पड़ा है. सोने और हीरे के जवाहरात भी ठाट से उसी तरह बिक रहे हैं. अगर कुछ नहीं बिक रहा है तो वह है खेतों से अनाज, सब्जियां और मंडियों से कच्चा सामान.

नोटबंदी की गाज गिरनी थी अमीरों पर, लेकिन गिरी है छोटे आम आदमी पर, जिसे 45 सौ रुपए लेने के लिए अकाउंट खोलने पड़ रहे हैं, लाइनों में खड़ा होना पड़ रहा है. शुरू में तो इन लोगों को कमीशन का कुछ पैसा मिला, पर अब वह भी मिलना बंद हो गया, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार ही सारा धन, काला हो या सफेद, बैंकों में जमा हो कर रिजर्व बैंक के पास पहुंच गया है. नोटबंदी की वजह से सिवा छोटे हलके नोट आए और पूरे 50 दिन देशभर में भूचाल सा आया रहा, इस के अलावा कुछ लाभ नहीं हुआ.

हो सकता है कि जिन्होंने अपना पैसा फर्जी खातों में जमा कराया था, उन्हें बाद में आयकर विभाग के लोग पकड़ें, पर वे क्या नोटबंदी का अमृत पी कर शरीफ हो गए हैं? वे भी देश का हिस्सा हैं और जानते हैं कि रिश्वत लेनादेना न तो बंद हुआ है और न हो सकता है. वे क्यों न रिश्वत की मांग कर के उन लाखों मामलों को निबटाएंगे, जिन में शक होगा कि नोटों की हेराफेरी हुई है? या तो ये मामले ऐसे ही पड़े रहेंगे या जम कर उसी तरह आयकर वाले पैसा बनाएंगे, जैसा 50 दिन बैंक वालों ने बनाया है.

रही बात चुनावों में दलों को कमजोर करने की तो वह भी आधीअधूरी लग रही है. जिन 5 राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, वहां तैयारियों में कोई फीकापन नहीं. हो सकता है कि भारतीय जनता पार्टी को फायदा हो, पर यह उस की धर्म और जाति को इस्तेमाल करने और मुसलिमों व दलितों के बारे में सोच का नतीजा होगा. नरेंद्र मोदी के यज्ञ में आखिर ऊंचों ने भाग लिया है और वे ही दिखेंगे, इस में शक नहीं. चुनावी सोच नोटबंदी को सही साबित तो नहीं करेगी.