सरस सलिल विशेष

मोबाइल हाथ में हो तो हाथों से कुछ और करने की उम्मीद करना बेकार ही है. यही आज की संस्कृति का मूल नियम है. अब लोग मौका ढूंढ़ते रहते हैं कि कहीं कुछ बुरा हो ताकि वे उस का वीडियो बना कर दुनिया भर को दिखा सकें. आप को सैकड़ों दुर्घटनाओं के वीडियो इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब  पर दिख जाएंगे जिन में दुर्घटना हो रही होगी पर वीडियो बनाने वाला अपनी जगह खड़ा लगातार फिल्मिंग कर रहा होगा.

मुंबई के हाईवे पर 2 मोटरसाइकिलों की टक्कर हो गई और एक में आग लग गई. जिस ने वीडियो बनाया उस ने उन्हें बचाने की कोशिश नहीं की और वीडियो में दिख रहा है कि कई लोग अपने मोबाइल निकाले खड़े हैं पर आगे बढ़ कर उन्हें बचाने कोई नहीं आ रहा.

मोबाइल ने लोगों को इस कदर निष्ठुर और उदासीन बना दिया है कि चार लोगों की वाहवाही पाने के लिए वे मानवता के मुश्किल से जमा हुए भावों को मारने को तैयार हैं. मानव सभ्यता का राज ही यह है कि एक आदमी मुश्किल में दौड़ कर दूसरे की सहायता करे. उसी से समाज के कानून बने, इसीलिए लोग शहरों में रहने आए कि समुचित सुरक्षा का एहसास बना रहे.

अब मोबाइलों ने यह नष्ट करना शुरू कर दिया है. सोशल मीडिया इस कदर बेरहम और बेजान हो गया है कि उसे दूसरे के दुखों में मजा आता है. खराब खबर फटाफट शेयर होती है. लोग किसी दुर्घटना के फोटो और वीडियो को भी ‘लाइक’ करते हैं, क्योंकि फेसबुक और यूट्यूब में ‘हेट’ का औप्शन अभी तक नहीं है. कुछ लोग मांग कर रहे हैं पर शायद कंपनी को लगता है गैरमानवीय भावनाओं से खेलने का मजा ही कुछ और है.

परपीड़न सुख की भावना कम ही जीवों में होती है. पशु खुद को जिंदा रखने के लिए दूसरे पशु को मार कर खा जाते हैं पर दूसरे के दुख पर वे मजा लेते हों, ऐसा नहीं है. दुर्घटना का तमाशा देखने के लिए लोग गाड़ी, स्कूटरबाइक रोक कर सड़क के बीच खड़े हो जाते हैं. पहले सिर्फ देखते थे अब फिल्माने लगे हैं ताकि उसे यूट्यूब पर डाल कर महानता का लाभ उठाया जा सके.

नई तकनीक का विरोध करना गलत है पर उस का दुरुपयोग हो रहा हो तो चिंता तो होगी ही. कारों, बाइकों में कितने ही सेफ्टी फीचर हों, सब से बड़ा सेफ्टी फीचर साथ चल रहा अनजाना यात्री है जिस पर पहले भरोसा किया जा सकता था, अब क्या मालूम आप की मुसीबत उस के लिए मोबाइल पर वीडियो बनाने के काम आए.