सरस सलिल विशेष

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा का मानना है कि देश में बहुत से कैदी अज्ञानता के कारण जेल काट रहे हैं जबकि लंबित मामले होने के बावजूद उन्हें जमानत मिल सकती थी. यदि कोई विचाराधीन कैदी अपनी अधिकतम सजा का आधा समय अदालती कार्यवाही के दौरान जेल में काट चुका हो तो उसे जमानत मिलने का प्रावधान है. पर इस बात के लिए जानकारी होना और फिर अदालत से आदेश लेने के लिए वकील करना हरेक कैदी के लिए संभव नहीं होता और वे जेल में सड़ते रहते हैं.

मुख्य न्यायाधीश ने इस गुनाह की जिम्मेदारी कैदी पर डाल दी जबकि दोष तो पुलिस अधिकारियों का है जो अदालत में कैदी के खिलाफ मुकदमा चला रहे हैं. यह उन्हें ही मालूम होता है कि अभियुक्त को किस धारा में पकड़ा गया है और कब उस धारा के अंतर्गत अधिकतम सजा का आधा समय बीत गया है. तो, यह उन का काम है कि वे अदालत को बताएं कि अब कैदी को जेल में रखने की आवश्यकता नहीं है.

नागरिक अधिकारों के प्रति पुलिस, अदालतों और सरकार का रवैया असल में आज भी 18वीं सदी का सा है जब एक बार जेल में जाने का अर्थ, वहीं मरना होता था. यदि नागरिक खुद अपनी रक्षा के उपाय न करें तो आज भी उन का वही हाल रहेगा.

लोकतांत्रिक संवैधानिक सरकार होने का अर्थ ही यह है कि पुलिस हर वह काम करे जो कानून ने उस से करने को कहा है और अपने अधिकारों का उतना ही उपयोग करे जितना कि कानून उसे इजाजत देता है. यदि वह कानून के बाहर जाती है तो आम नागरिक की तरह वह भी गुनाहगार है और उसे उसी तरह की सजा मिले जैसी आम नागरिक को मिलती है, यानी जेल में कैद.

अगर मुख्य न्यायाधीश अपनी बात के प्रति गंभीर हैं तो उन्हें पुलिस अफसरों को चेतावनी देनी चाहिए कि यदि ऐसे मामले में कैदी को खुदबखुद न छोड़ा गया तो जिम्मेदार पुलिस वालों के खिलाफ मुकदमा किया जा सकता है. पर, ऐसा होगा नहीं. सरकारें, दरअसल, इस संकल्प पर चलती हैं कि ‘किंग कैन डू नो रौंग’ अर्थात सरकार तो गलत हो ही नहीं सकती. भई, तभी तो सरकार बनाने में इतनी मारामारी होती है.