सरस सलिल विशेष

विभाजन के गड़े मुरदे मोहम्मद अली जिन्ना को, अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में लगे उन के चित्र को ले कर, उखाड़ा जा रहा है. एक व्यर्थ की बहस की शुरुआत की गई है कि 1947 में देश के विभाजन के लिए आखिर जिम्मेदार कौन था – मोहम्मद अली जिन्ना जो पाकिस्तान के कायदे आजम बने या कांग्रेस जिस ने उस के बाद दशकों तक राज किया?

विभाजन एक ऐसी बात थी जिस का 1947 से पहले चाहे अंदाजा था पर उसे इस बुरी तरह मारपीट की शक्ल मिलेगी, इस का अंदाजा नहीं था. भारत में नरसंहार के लिए मुसलमानों को दोषी ठहराया जाता है और पाकिस्तान में हिंदुओं को. कोई भी यह कहने को तैयार नहीं है कि असल में जिम्मेदार कौन था और कितना गुनाहगार था. आज इस बात को न उठाया जाए तो ही अच्छा है, क्योंकि इस में बहुत सी कड़वी सचाइयां ही सामने नहीं आएंगी, बल्कि 1947 के विभाजन के कारण जो आज भी सामने हैं, दिखने लगेंगे.

आज जिस तरह भीमराव अंबेडकर की मूर्तियों को तोड़ा जा रहा है और गांधी की मूर्तियों पर कालिख पोती जा रही है उस से साफ है कि देश का एक वर्ग उन्हीं मूर्तियों को चाहता है जिन के जरिए वह पैसा उगाहने में सफल हो. देश के कोनेकोने में देवीदेवताओं की मूर्तियों को लगाया जा रहा है, क्योंकि उन के माध्यम से वे ही लोग पैसा कमा रहे हैं जो जिन्ना के फोटोग्राफ या अंबेडकर की मूर्तियों से चिढ़ रहे हैं.

1947 की बात याद दिला कर कट्टरपंथी असल में यह बात दोहरा रहे हैं कि देश में पौराणिक राज चलेगा और जिसे पौराणिक अभयदान नहीं है उस की देश में जरूरत नहीं है. इन लोगों ने अपनी गिनती कुछ को बहलाफुसला कर बढ़ा ली है वरना ये धर्म के पैरोकार रहते हुए भी बेचारे ही थे. अब हिंदूमुसलिम राग आलाप कर असल में वे जाति के घाव कुरेद रहे हैं जो वर्षों से ढके हुए हैं.

मोहम्मद अली जिन्ना की फोटो का अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में कोई खास औचित्य नहीं है और वैसे ही किसी देवीदेवता, मदन मोहन मालवीय, दयानंद, दीनदयाल उपाध्याय, जवाहरलाल नेहरू, मोहनदास कर्मचंद गांधी के चित्रों का भी कोई महत्त्व नहीं है. ये सब इतिहास की किताबों में शोभा देते हैं, दीवारों और सड़कों पर नहीं.

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