सरस सलिल विशेष

कर्नाटक चुनावों में भी जिस तरह दलितों, पिछड़ों व मुसलिमों का मुद्दा उछला उस से साफ है कि आजादी के 70 साल बाद भी देश की पहले नंबर की उलझनों में जातिधर्म ही है, पैसा, गरीबी, बिजली, पानी, नौकरी नहीं. अब तक भारतीय जनता पार्टी हिंदूमुसलिम मुद्दा उछाल कर काम चला लेती थी और दलितपिछड़ों का मुद्दा हिंदूमुसलिम झगड़े में छिप जाता था. अब भगवाधारी मुखर हो गए हैं कि उन के हाथों में हिंदू राजाओं की पेशवाई ताकत आ गई है और वे पौराणिक ग्रंथों के हिसाब से जाति के हिसाब से देश, सरकार व समाज को चलाएंगे.

उच्चतम न्यायालय के असर वाले फैसले के बावजूद कर्नाटक चुनावों में भाजपा को बारबार साफ करना पड़ा है कि वह दलितों के खिलाफ नहीं है पर देशभर में फैले खुद को भाजपाई कहने वाले दलितों पर दंगई करते रहे हैं और भाजपा सही सफाई न दे पाई. हार कर नरेंद्र मोदी को राहुल गांधी के पुरखों को कोसने की ऐसी ही जरूरत आ पड़ी जैसी पौराणिक कहानियों में शूद्र पुत्रों को कोसा जाता था.

दलित पिछड़ों को बराबरी की जगह न देने का ही देश को हजारों सालों से नुकसान भरना पड़ा है. हमारे यहां युद्ध के समय दलितों व पिछड़ों को हथियार नहीं दिए जाते थे कि कहीं वे बाद में सवर्णों के खिलाफ इस्तेमाल न हो जाएं. इसीलिए बारबार थोड़े से सैनिकों के साथ बीहड़ पहाडि़यों को पार कर आने वाले भी देश पर राज करते रहे हैं. देश पर उच्च हिंदू राज कब हुआ यह ढूंढ़ना ही मुश्किल है. यह सिर्फ पुराणों में लिखा मिलता है. ऐतिहासिक सुबूत नहीं दिखते.

आज जो लोग सपना देख रहे हैं कि दलित पिछड़ों के बगैर देश को चीन, जापान, यूरोप, अमेरिका बनाया जा सकता है, बेहद गलतफहमी में हैं. भारतीय जनता पार्टी की कर्नाटक जीत से साफ है कि देश अभी उसी वर्ण व्यवस्था के मुद्दे को सुलझाने में लगा है. प्रगति की बातें तो बस दिखावटी हैं.