सरस सलिल विशेष

देश के 65 पूर्व प्रशासकों ने एक खुला पत्र लिख कर चिंता व्यक्त की है कि नरेंद्र मोदी की सरकार के आने के बाद देश में न केवल सुनियोजित मुसलिम विरोधी, दलित विरोधी माहौल बनाया जा रहा है, बल्कि असहिष्णुता का वातावरण भी बना डाला गया है. पूर्व पुलिस अधिकारी जुलियो रिबेरो, जवाहर सरकार, हर्ष मंडेर, अरुणा राय जैसे प्रशासकों ने कहा है कि भारतीय संविधान की भावना के विरुद्घ अपने को बहुमत में कहने वाले अपना मन दूसरों पर थोप रहे हैं और धार्मिक परदे के सहारे उदार व तार्किक लोगों को भी अल्पसंख्यकों की तरह कठघरे में खड़ा किया जा रहा है.

इस में सत्तारूढ़ पार्टी के देशभर में फैले सैकड़ों भगवा गमछाधारी दबंग तो शामिल हैं ही, प्रधानमंत्री से ले कर केंद्रीय मंत्री, पार्टी के सांसद, कई मुख्यमंत्री भी शामिल हैं. ये सब हिंदू कट्टर, पौराणिक परंपराओं के नाम पर हिंदू धर्म को थोपना चाहते हैं.

खुले पत्र में पशु व्यापार पर प्रतिबंध, गौरक्षकों की फौज और शिक्षा संस्थानों पर भगवा कब्जे की खुल कर बात की गई है. संविधान की आत्मा कहती है कि इस देश में मसले बहस से हल होंगे, डंडों के जोर से नहीं, लेकिन आज लोकतंत्र को जिस तरह जूतों से कुचला जा रहा है, वह देश को तानाशाही की ओर ले जा रहा है.

आमतौर पर तटस्थ रहने वाले नौकरशाहों का इस तरह खुल कर सामने आने का अर्थ है कि वे स्थिति की गंभीरता को समझ रहे हैं. वे जानते हैं कि जो विषैले बीज बोए जा रहे हैं उन का असर पीढि़यों तक रहेगा और ये पेड़ बड़े होने पर महामारी फैलाएंगे. सरकार अपनी विषैली नीति को थोपने के लिए हर तरह के कानूनी डंडे का इस्तेमाल कर रही है और वे प्रशासक, जो 25-30 वर्ष इन कानूनों को लागू करते रहे हैं, अच्छी तरह जानते हैं कि ये कानून किस तरह आम नागरिक की कमर तोड़ सकते हैं.

स्वतंत्रता ही उत्पादकता व विकास को सब से बड़ी उर्वर जमीन देती है. अंगरेजों से लड़ाई केवल इसलिए नहीं लड़ी गई थी कि वे गोरे रंग के थे, इसलिए भी लड़ी गई थी कि वे भारत के नागरिकों को वह स्वतंत्रता नहीं दे रहे थे जो उन के अपने देश में थी. अमेरिका की आर्थिक सफलता के पीछे यही स्वतंत्रता रही है जो भारत में 1947 के बाद से बड़ी सीमित मात्रा में मिली. कुछ सरकारी तो कुछ सामाजिक बंधन ऐसे थे कि यहां का नागरिक कभी पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं रहा.

देश में थोड़ीबहुत जो स्वतंत्रता रही, अब उसे भी कुचला जा रहा है. जो हो रहा है वह हिंदू समाज के पुनर्जागरण का नहीं, देश की भयंकर बीमारी का लक्षण है.