सरस सलिल विशेष

दिल्ली के एक कालेज की छात्रा गुरमेहर कौर का दिलेरी से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से पंगा लेना भजभज मंडली को पसंद नहीं आया. उस पर देशद्रोही होने का आरोप तो मंडली नहीं लगा सकी क्योंकि वह कारगिल युद्ध में शहीद हुए कैप्टन मंदीप सिंह की बेटी जो है पर उस को बुराभला कहने में कोई कसर नहीं छोड़ी. ऋषियोंमुनियों के चरणस्पर्श कर के धन्य समझने वालों ने उसी भाषा का इस्तेमाल किया जो वे ऋषिमुनि, राजाओं और सामान्य व्यक्तियों से ग्रंथों में कहते पाए जाते हैं, जैसे तरहतरह के श्राप देना. कुछ ने उसे पथभ्रष्ट माना तो कुछ ने उसे नर्क में सड़ने का आदेश दिया. कुछ चार कदम आगे निकल गए और बिना सोचेसमझे उसे वेश्या या बलात्कार का उपयुक्त पात्र मानने लगे. बजाय उस की बात सुनने के, उस की जबान खींचने की कोशिश की गई.

ये उपाय सदियों से किए जा रहे हैं. कितने ही दस्युराजाओं को छलकपट से देवतास्वरूप राजाओं ने ऋषियोंमुनियों से श्राप दिलाने का भय दिखा कर हराया है और एकलव्य व शंबूक जैसों को सीधा किया है.

ईसाई चर्च, इसलामी मुल्लों और हिंदू पंडों ने एकसा व्यवहार किया है इस मामले में. और अगर दूर का भी यह अंदेशा हो कि एक मशाल ऐसी जल रही है जो कागजी महलों को जला सकती है तो उसे बुझा दिया जाता है.

वैसे तो धर्म के नाम पर सदा राजाओं और धर्र्म के दुकानदारों ने शक्ति हासिल कर राज किया है पर अब लोकतांत्रिक अधिकारों के जमाने में हर रोज ऐसे मुद्दे खड़े हो रहे हैं जो धार्मिक साम्राज्य पर हमला करते हैं. इन का मुकाबला करना जरूरी होता जा रहा है. गुरमेहर कौर ने धर्म के खिलाफ कुछ नहीं कहा पर धर्म की रक्षक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को चुनौती दे डाली. उस का यही एक बड़ा गुनाह है, शंबूक के वेद पढ़ने और एकलव्य के धनुर्विद्या सीखने की तरह का.

उसे धमकाने को सैकड़ों पंडे और द्रोणाचार्य खड़े हो गए क्योंकि देश की धुरी 1947 के बाद से ही उन के हाथों में है जो पूजापाठ के सहारे शासन करना चाहते हैं और जिन्होंने न जाने कैसे अभिव्यक्ति की आजादी को देने वाला संविधान स्वीकार कर लिया पर अब देशभक्ति के नाम पर अभिव्यक्ति को दिखावटी गहने का सा बनाने की

कोशिश की जा रही है. अगर विचारों की अभिव्यक्ति वास्तव में एक स्वतंत्रता होती तो गुरमेहर कौर को शासकों से सीधे गालियां न सुननी पड़तीं और उसे मुंह बंद रखने का फैसला न करना पड़ता.