सरस सलिल विशेष

सरकार अब विचारों की स्वतंत्रता का गला घोंटने की पूरी तैयारी कर रही है और देश के एकलव्यों का अंगूठा काटने का इतिहास एक बार फिर दोहराया जाएगा, यह दिख रहा है. एक न्यूज चैनल पर इंटैलीजैंस ब्यूरो ने कार्यवाही तो कर ही ली, सरकार की सैकड़ों धर्मभक्त संस्थाएं अपनीअपनी जगह स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति को कुचलने की तैयारी में हैं.

केरल चलचित्र अकादमी के एक फैस्टिवल में केंद्र सरकार ने कश्मीर, दलित छात्र रोहित वेमूला और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पर बनी डौक्यूमैंट्रियों को प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया है.

सरकार की सोच है कि जो 2 हजार साल पुराने सिद्धांतों, संस्कारों, नियमों, कानूनों, रीतिरिवाजों को नहीं मानेगा उसे इसलामी देशों की तरह देश में रहने का हक नहीं होगा. देश में केवल कुछ को सोचनेविचारने का हक होगा जो निश्चित रूप से भगवाई होंगे.

युवाओं के लिए यह संदेश गलत है. एकलव्य खुद इस गुरु पूजा का शिकार था, क्योंकि उस ने द्रोणाचार्य की मूर्ति बना कर धनुर्विद्या का अभ्यास किया. आदिवासी एकलव्य खुदबखुद द्रोणाचार्य का मुकाबला कर सकता था पर पौराणिक काल्पनिक काल में भी वह मानसिक गुलाम था और आज की सरकार युवाओं को फिर मानसिक गुलामी की ओर धकेल रही है. अगर प्रियंका चोपड़ा ने नरेंद्र मोदी के सामने बैठ अपने घुटने दिखा दिए या दीपिका पादुकोण ने अपनी सुंदर काया का प्रदर्शन कर दिया तो भगवा हल्ला शुरू ही नहीं हो जाता, अदालतों का नाजायज उपयोग कर पुलिसिया कार्यवाही शुरू कर देते हैं.

आज भारत का युवा फिर 18वीं नहीं, 8वीं सदी में लौटने को मजबूर है और जैसे 8वीं सदी में भारत के दरवाजे विदेशियों के लिए खुले पड़े थे, आज भी ऐसा ही होगा. चीन तो अपने युवाओं की मेहनत के बल पर विश्व नेता बनने की जीतोड़ कोशिश कर रहा है और हमें योग, आयुर्वेद, गाय से फुरसत नहीं. ठीक है हमारे कुछ लोग मेहनत कर के रौकेट भी छोड़ रहे हैं और कुछ उद्योगपति दुनिया भर में नाम कमा रहे हैं, पर यह तो ईरान, उत्तरी कोरिया और पाकिस्तान भी कर लेता है.

किसी देश की उन्नति तब होती है जब पूरा देश आगे बढ़े, कुछ लोग पहाडि़यों पर भव्य मकान बना कर यह नहीं कह सकते कि देश का विकास हो गया है, जबकि देश का अधिकांश हिस्सा रोजमर्रा की पानी की किल्लत या रोजगार की कमी से जूझ रहा हो. रोहित वेमूला या जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कन्हैया कुमार विकास के दूत नहीं हैं, पर दिमाग के दरवाजों को खटखटाने वाले जरूर हैं और देश का सभ्य, शिक्षित व अब सत्ताधारी समाज उसी खटखटाहट से बेहद परेशान है. यह परेशानी अगर बंदूकों से दूर की जाएगी तो भारत का लोकतंत्र भी मखौल बन कर रह जाएगा.