सरस सलिल विशेष

दिल्ली के समाचारपत्रों में अब पूरे फ्लोर के भव्य फ्लैटों वाले बहुमंजिले मकानों के विज्ञापन दिखने लगे हैं जिन में एक फ्लैट 10-20 करोड़ रुपए का या और ज्यादा का भी होता है. मुंबई, बेंगलुरु में ऐक्टर, खिलाड़ी, उद्योगपति 20-30 करोड़ रुपए के फ्लैट खरीदने लगे हैं. ऐसे मकानों का निर्माण एक मुनाफे का धंधा बन रहा है. बहुत से बिल्डरों ने छोटे फ्लैटों को बनाना ही बंद कर दिया है, ताकि वे खिचखिच से बच सकें.

लंदन की नाइट फ्रैंक रियल एस्टेट कंसल्टैंसी फर्म का कहना है कि भारत में 2017 में 200 करोड़ रुपए से ज्यादा की निजी संपत्ति वालों में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. ये अब सवा लाख से ज्यादा हो गए हैं और इन्होंने रहने को आलीशान मकान खरीदने शुरू कर दिए हैं. पहले इस तरह के लोग बंगले खरीदते थे पर अब फ्लैटों में रहना पसंद करते हैं. चीन के गुआंगजू व अन्य शहरों में इस तरह के मकानों की संख्या बढ़ी है और दाम भी बढ़े हैं.

भारत में गुरुग्राम उन शहरों में है जहां ऊंचे, अति अमीरों के लिए मकान बन रहे हैं क्योंकि पास में अरावली पहाडि़यां हैं. मुंबई में केवल उन इलाकों में ही ऐसे मकान बन सकते हैं जहां समुद्र दिखे वरना ऊपरी मंजिलों से भी झोंपड़ बस्तियां ही दिखती हैं.

यह विडंबना है कि जिस देश में 40 करोड़ लोगों के पास पटरियां ही रहने को हैं वहां 10-20 करोड़ रुपए के फ्लैट बनने लगे. मुकेश अंबानी का मकान दक्षिण मुंबई में यह दर्शाता है कि वे अपने पैसे का प्रदर्शन करने में हिचकते नहीं हैं जबकि उस भव्य मकान के एक किलोमीटर के दायरे में खंडहर होते मकानों की भरमार है.

पैसे का यह भेदभाव हमेशा रहा है पर उम्मीद थी कि नई तकनीक, लोकतंत्र, सही टैक्स व्यवस्था लोगों को बराबर नहीं, तो बराबर का सा तो करेगी ही. लेकिन सारे लोकतंत्र इस बारे में फेल साबित हुए हैं. कम्युनिस्ट चीन को भी कमाऊ अरबपतियों को छूट देनी पड़ी. हालांकि चीन ने दूसरे देशों की अपेक्षा अपने गरीबों का बहुत खयाल रखा है और वहां उन की संख्या बहुत कम हो गई. भारत में गरीब अभी भी 18वीं सदी का सा जीवन जी रहे हैं और अमीर आलीशान महलों में जा रहे हैं.

यह देश की गलत नीति है. अमीरों के बंगले तो छिपे रहते हैं पर 20-30 मंजिले अरबपतियों के भव्य मकान आंखों में कंकर बनते हैं. यह भयावह सामाजिक प्रदर्शन है जिसे एक अक्लमंद सरकार होने नहीं देती. पर हमारे यहां अब सबकुछ भाग्य पर छोड़ दिया गया है. भव्य मंदिर भी धड़ाधड़ बन रहे हैं और भव्य महलों जैसे फ्लैट भी. यह ज्वालामुखी के मुंह में लावा डालने जैसा है.

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