सरस सलिल विशेष

देश के पूर्वोत्तर में जो चुनावी सफलता भारतीय जनता पार्टी को मिली थी और जिस तरह उस ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को हार का तोहफा दिया, वह अप्रत्याशित है. भारतीय जनता पार्टी की त्रिपुरा विजय का कारण उस की छिपी पैदल सेना है

जो अन्य दलों के पास न के बराबर है. भाजपा को असली समर्थन लाखों मंदिरों, मठों, आश्रमों, ज्योतिषाचार्यों आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं, योग गुरुओं, वास्तु विशेषज्ञों, कुंडली पढ़ने वालों, विवाह कराने वालों, पिंडदान कराने वालों से मिलता है. भाजपा ने जाति का भेद बरकरार रखते हुए दलितों यानी पिछड़ों और पिछड़ों के संपन्न वर्गों को अपनेअपने देवीदेवता और आश्रम दे कर उन्हें जोड़ लिया है.

आज धर्म का धंधा विशाल हो गया है. ये सभी भाजपा के समर्थक हैं. इन का अस्तित्व ही भाजपाई सोच पर निर्भर है. देश की अंधविश्वासी जनता इन पर भरोसा करती है और ये भाजपा में अंधविश्वास रखते हैं.

ममता बनर्जी हों, मायावती हों, अखिलेश यादव हों, राहुल गांधी हों, हार्दिक पटेल हों या हों कन्हैया कुमार, सभी इस फौज के आगे जीरो हैं. चुनावी रण में यही फौज सब से अधिक उपयोगी है. भाजपा उक्त फौज वालों के लिए लगातार आय का इंतजाम कर रही है और अब वे भाजपा के लिए वोट जुटा रहे हैं. जनता को, दरअसल, ये सब चूस रहे हैं, निकम्मा बना रहे हैं, भटका रहे हैं, पर भाजपा यह बताएगी नहीं, और दूसरी पार्टियां यह बताने की हैसियत नहीं रखतीं. बिहार व उत्तर प्रदेश के उपचुनावों में भाजपा की हार इसलिए हुई कि इस फौज के आगे जनता ने सिर नहीं झुकाया.

दूसरी पार्टियां जब तक दिनरात बढ़ती इस फौज का मुकाबला तार्किक, व्यावहारिक, वैज्ञानिक सोच को जनता के आगे रख कर नहीं करेंगी, वे पूर्णतया सफल नहीं होंगी. वैसे यह फौज अनुत्पादक है, जनता को मूर्ख बनाने वाले निकम्मों की है पर फिर भी कोई इस फौज की पोल खोलने को तैयार नहीं. इस फौज की बेईमानी नीरव मोदी जैसों से 100 गुना ज्यादा है. पार्टियां इन का समर्थन करती रही है.

अखिलेश यादव और मायावती भाजपा की लगातार जीत से घबरा कर एकजुट हो गए, लेकिन इन दोनों के सहायकों में इस फौज के छिपे सिपाही मौजूद हैं. वे समयसमय पर अंदर से पलीता जरूर लगाएंगे. राहुल गांधी तो स्वयं फौज के हिस्सेदार हैं क्योंकि अपने जन्म से ही कांग्रेस इस फौज का हिस्सा रही है और भाजपा, उसी कांग्रेस का कट्टररूप भर है.

विपक्षी दलों को अगर एक होना है तो उन्हें इस फौज को नियंत्रित करना होगा, इस की चालबाजी का भंडाफोड़ करना होगा ताकि भाजपा को इस फौज के बचाव में आ कर इस की मिल्कीयत को मानना पड़े. यह आसान नहीं है. वैसे इस फौज पर नियंत्रण होने से जनता को तुरंत लाभ मिलेगा और वह धार्मिक धंधों के चक्रव्यूह से निकल सकेगी. पर इस के लिए जो तार्किक सोच चाहिए वह दिख नहीं रही.

आज देश को अंधविश्वासों के जंजाल से निकालना जरूरी है, हमारी प्रगति उसी पर निर्भर है. 2018 में हम 1518 की सोच से काम नहीं कर सकते.

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