सरस सलिल विशेष

सरकार को एहसास हो गया है कि देश की सड़कों और रेलों को सुधारना आसान काम नहीं है. आज सड़क बनाओ कल उस के किनारे मकानदुकानें बन जाएंगी और सड़क छोटी पड़ जाएगी. सड़कों को चाहे कैसे भी बना लें, उन में झील जितने बड़े गड्ढे बन ही जाएंगे. रेलों का हाल भी यही है. जितनी मरजी रेलें चला लो गरीब, फटेहाल पोटलियां लिए चले आएंगे. टिकट लें या न लें, पान की पीक जरूर डालेंगे. बदबू और गंदगी का आलम यह है कि अब शायद सूअरों और कुत्तों को भी यह जगह गंदी लगती है.

इसलिए अब सरकार करीब 50 छोटे एअरपोर्टों को ठीक कर रही है ताकि पैसे वाले लोग बिना गरीबों के साथ कंधे से कंधा मिलाए चल सकें और छोटे कसबों और शहरों के बाहर बन रहे आलीशान फ्लैटों में जा कर आराम से रह सकें. विकास के नाम पर देश को कई हिस्सों में बांटा जा रहा है और हवाई यात्रा करने वाले तो खास हैं ही.

औरतों को तो इन छोटे एअरपोर्टों से बहुत आराम रहेगा. मायका या ससुराल यदि ऐसे शहर में हो जहां एअरपोर्ट न हो, तो बड़ी कच्ची होती है. रिश्तेदार आने से कतराते हैं और कई बार बुलाने से भी कतराते हैं. ट्रेन, बस से आने वाली बेटीबहू को लेने गंदे स्टेशन या बस स्टैंड पर घंटों इंतजार करना पड़ता है और बदबू सहनी पड़ती है. हवाईअड्डा चाहे छोटा ही क्यों न हो, होगा तो खास लोगों के लिए ही न. गाड़ी पार्क करने की भी सुविधा है और स्नैक काउंटर भी अच्छा है.

हवाईअड्डों पर चोरीचकारी कम होती है. बस या रेल में अकेले बीवी, बेटी, बहू को भेजना एक आफत रहती है. मोबाइल होते हुए भी हादसे का डर लगा रहता है. फिर समय तो ज्यादा लगता ही है.

यह हो सकता है कि ट्रैफिक न होने के कारण इन छोटे हवाईअड्डों का बहुत लाभ न हो पर यदि जेब में पैसे हों तो छोटा हवाईजहाज किराए पर ले कर जाया जा सकता है. खर्च चाहे सैकड़ों की जगह लाखों में हो, शान तो रहती है. आज शान बघारना काम करने से ज्यादा इंपौर्टैंट है न.

हवाई सेवाएं विकास की निशानी हैं पर जमीनी हकीकत से दूर हैं. हमारे नेता, अफसर, बिजनैसमैन सब को बराबर का अवसर न मिले, इस की कोशिश में लगे रहते हैं और ऊंचनीच जो घरों में रसोई से चालू होती है, रगरग में बस गई है.