सरस सलिल विशेष

केंद्र सरकार ने कुछ क्षेत्रों में 49 प्रतिशत तक विदेशी पूंजी निवेश किए जाने की अनुमति दी है. यह उस अनुमति से अलग है जिस में विदेशी कंपनियां विदेशी पूंजी के साथ भारत में पूरी तरह व्यापार व उत्पादन कर सकती हैं.

सिद्धांत के अनुसार किसी देश को अपनी भौगोलिक सीमाएं आर्थिक लेनदेन के लिए बंद नहीं करनी चाहिए. जब तक विश्व व्यापार है, तैयार सामान आए, पूंजी आए, निवेश आए, फैक्टरियां आएं, दुकानें आएं, सब एकसमान हैं. एक जगह का सामान सदियों से बहुत दूर तक बिकता रहा है. मोहनजोदड़ो की मुहरें अरब व यूरोप के देशों तक में मिली हैं. विश्व व्यापार भाईचारा, दोस्ती तो बढ़ाता ही है, यह तकनीक के अदलबदल का रास्ता भी खोलता है. इस पर किसी तरह का बंधन गलत है.

कठिनाई यह है कि जब लंबे समय तक आप व्यापार के एक ढर्रे के आदी हो चुके हों और बाहर के पैसे वाले व्यापारियों को देश में व्यापार करने के लिए खुली छूट दे दी जाए जो लंबे समय तक इंतजार करने को और हानि उठाने को तैयार हैं, तो देशी व्यापारी बेमौत मर जाएगा. भारतीय व्यापारी बहुत थोड़ी सी पूंजी पर काम करता है. 90 प्रतिशत व्यापारी कम पढ़ेलिखे हैं. वे बहीखाता तक नहीं बना सकते. उन्हें पत्र लिखना भी नहीं आता. इन्हें उन लोगों के सामने खड़ा कर दिया जाता है जिन के पास तकनीक है, हुनर है.

चूहे बड़ेबड़े दरवाजे काट देते हैं पर एक बिल्ली के आते ही वे मारे जाते हैं. भारतीय व्यापारी भी ऐसे ही हैं जो अपने ग्राहकों व उत्पादकों की अज्ञानता का लाभ उठा कर सस्ता व घटिया सामान बेचते हैं जबकि पैसे पूरे वसूल करते हैं. वे विदेशी कंपनियों के आगे टिक ही नहीं पाएंगे. विदेशी गाडि़यां आने से बिड़ला की ऐंबैसेडर गाड़ी गायब हो गई जबकि बिड़ला समूह विशाल है, पैसे वाला है.

आज कितने ही देशों से कल तक के जानेमाने देशी उत्पाद गायब हो गए हैं. विदेशी कंपनियां खुदरा व्यापार आदि में आएंगी तो देश का व्यापारी, जो पहले ही जीएसटी व नोटबंदी की मार से कराह रहा है, और ज्यादा रोने लगेगा. उस का विनाश हो जाएगा. व्यापार का यह एक तरह से ब्राह्मणीकरण है जिस में पंडों ने विदेशी व्यापारी को प्रमुखता दी है क्योंकि वह मोटा चढ़ावा चढ़ा रहा है. भारत सरकार के अफसर और नेता सोचते हैं कि उन के बेटेबेटी विदेशी कंपनियों में काम करेंगे तो उन्हें ज्यादा पैसे मिलेंगे, देशी व्यापारियों के यहां काम करेंगे तो दुत्कारे जाएंगे.

आज व्यापारिक फैसले देश का व्यापारी वर्ग नहीं ले रहा, वे नेता और अफसर ले रहे हैं जो व्यापारियों को वर्णव्यवस्था के अनुसार निचले स्तर पर रखते हैं.

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