सरस सलिल विशेष

टिप देना बुरा है यह सुन कर कुछ अजीब लगा. नए रेलमंत्री पीयूष गोयल का कहना है कि रेल कैटरिंग कर्मचारियों का खाना सर्व करने के बाद टिप लेना अवैध है और यह तुरंत बंद होना चाहिए. यह सच बात है कि रेल कैटरिंग के कर्मी अक्सर टिप के लिए जिद करते हैं और यदि कुछ लोग न दें तो उन्हें जलील करने से भी बाज नहीं आते. रेलवे के ज्यादातर कैटरिंग कर्मी सीधे रेलवे द्वारा नियुक्त नहीं होते. उन्हें वे कौंट्रैक्टर रखते हैं, जो रेलवे ने मोटी लाइसैंस फीस ले कर नियुक्त किए होते हैं.

रेलमंत्री ने टिप को बुरा कहा पर भाजपा के आकाओं की नीति तो दान देने की और रोज देने की है. जितने भी स्वामी, गुरु, बाबा, संतमहात्मा हैं सब हर समय बिना काम के पैसे देने की वकालत करते रहते हैं और हमें इन सब पर और इन के कथनों पर बड़ा गर्व रहता है. ‘भगवान टिप’ वसूलने के लिए हर मंदिर में कदम कदम पर दानपेटियों का इंतजाम होता है, जिन में 1 नहीं 7-7 ताले लगे होते हैं.

जहां संस्कृति और संस्कारों का मतलब बिना काम किए टिप या दान देना हो, वहां सेवा के बदले टिप मांगना और देना कैसे बुरा हो सकता है? आप को आप की सीट तक खाना पहुंचाया जा रहा है यह क्या कम कृपा है रेलवे कैटरिंग कौंट्रैक्टरों की? पैसे तो वे लेंगे ही पर टिप का अधिकार तो ऊपर से नीचे तक सब का है और यह कैसे बंद हो सकता है?

जरा देखिए तो कि जहां टिप नहीं वहां रेल कर्मचारी कैसा काम करते हैं. रेलवे स्टेशनों पर भारी भीड़ होती है, अफरा तफरी होती है, क्योंकि यहां रेल कर्मचारियों को टिप नहीं मिलती. टिकट खिड़कियों पर टिकट लेने में घंटों लगते हैं, क्योंकि यहां कर्मचारियों को टिप नहीं मिलती. अगर भीड़ का दबाव न हो तो टिप न मिलने के कारण आप को प्लेटफार्म पर घुसने देने में भी आनाकानी होने लगेगी.

‘सेवा के लिए पैसा ले लिया गया तो टिप क्यों’ जैसी सोच ही गलत है, कम से कम हमारे यहां जहां हर नेता बिना सेवा किए ही जीने देने के लिए टिप लेता है. टिप तो एक अधिकार है जो सेवा देता है चाहे इसे अच्छी सेवा का इनाम माने या जबरन वसूली.

इस देश में सरकारी क्षेत्रों में ही नहीं प्राइवेट रेस्तराओं ने भी 10 से 15% जबरन टिप बिल में शामिल करनी शुरू कर दी है. उन्होंने टिप को विधिवत रूप दे दिया और फिर वेटर ऐसे खड़ा हो जाता है कि ग्राहक को टिप देनी ही होती है.

जापान ऐसा देश है जहां टिप का रिवाज बिलकुल नहीं है. उधर अमेरिका ऐसा देश है जहां पगपग पर टिप दी जाती है और अच्छी खासी दी जाती है.

टिप गलत है इस में संदेह नहीं. सेवा देने वाला अपनी पूरी सेवा का चाहे जो मूल्य तय कर ले उस पर ग्राहक का नियंत्रण नहीं है. उस के बाद जो पैसा चाहा जाए वह गलत है.

एक कर्मठ समाज को केवल मेहनत का मुआवजा मांगना चाहिए. मुफ्तखोरी चाहे वह दान हो या हफ्तावसूली केवल अपराध की गिनती में आना चाहिए.