सरस सलिल विशेष

गोवा और पंजाब के चुनावों में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भारतीय जनता पार्टी व कांग्रेस को टक्कर तो जरूर दे रही है, जीतेगी या नहीं, यह 11 मार्च को पता चलेगा. आम आदमी पार्टी की शुरुआत ही अपनेआप में एक खुश करने वाली बात है, क्योंकि इस तरह की पार्टियों में न तो वंशवाद चलता है, न ये लकीर की फकीर होती हैं.

लोकतंत्र का मतलब सिर्फ वोट डालना नहीं होता, कुछ नई सोच लाना और नए नेता भी पैदा करना होता है और आम आदमी पार्टी यह काम जरूर कर रही है. 2014 के लोकसभा के चुनावों में मात खाने के तुरंत बाद दिल्ली में 70 में से 67 सीटें जीत कर इस ने भारतीय जनता पार्टी की हवा निकाल दी थी, पर भारतीय जनता पार्टी के तेवर ढीले न कर पाई. पंजाब और गोवा में सत्ता में बैठी पार्टी को हिला देना ही काफी है.

सत्ता में बदलाव लोकतंत्र का असल मुनाफा है. अगर वही लोग बारबार जीत कर आते रहें, तो वोट देने का मतलब नहीं रह जाता. 1947 के बाद कांग्रेस लगातार जीतती रही है और यही देश के नुकसान की वजह रही है. भारतीय जनता पार्टी जीती तो कम है, पर इस में सिरमौर वही लोग बने रहे हैं, जो धर्म, जाति, संस्कारों, रीतिरिवाजों से बंधे हैं और इसीलिए जहां भी जीतते हैं, कुछ नया नहीं कर पाते.

दूसरे देशों में जब भी तरक्की हुई है तब हुई है, जब सरकार की सोच, रवैया और नेता बदले. चीन 1960 में भारत के बराबर था. आज औसत चीनी औसत भारतीय से 5-6 गुना ज्यादा अमीर है, क्योंकि माओत्से तुंग के बाद नए लोगों ने नए तौरतरीके अपनाए. भारत में 1991 में नरसिंह राव व मनमोहन सिंह ने नया दौर शुरू किया और मंडल आयोग लागू किया, जिस से नई सोच आई और देश चमका, पर फिर पुराने दलदल में जा बैठा.

2014 में जिस बदलाव की उम्मीद की थी, वह नहीं दिख रही. उलटे नोटबंदी की सजा मिल गई. ऐसे में नई उम्र वाले अरविंद केजरीवाल और कुछ हद तक नए धुलेपुछे अखिलेश यादव व राहुल गांधी से नए की उम्मीद की जा रही है. गोवा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में कोई भी जीते, नए पौधे लग गए हैं, यह पक्का सा है. इस का लाभ जरूर होगा.

जरूरत यह है कि गांवगांव, कसबेकसबे में नए लोगों की पौध उपजे. शासन पुरानी लकीर पर न चले, यही आज की जरूरत है. दुनिया अब थम रही है और भारत जैसे देशों के लिए यह बात फायदेमंद साबित हो सकती है कि जब अमेरिकायूरोप अपने में सिमट जाएं, तो हम पैर फैला सकें.