सरस सलिल विशेष

बिहार के गया जिले के एक गांव में एक दलित बूढ़े जोड़े को पीटपीट कर मार डाला, क्योंकि उन का 20 साल का नाती एक पिछड़ी जाति की लड़की के साथ भाग गया था. जाहिर है कि मामला प्रेम का है, पर चूंकि पिछड़ी जाति की लड़की अछूत के लड़के के साथ भाग जाए, यह आज भी गांवों में ही नहीं, बल्कि शहरों में भी सहन नहीं होता. जाति का जहर इस कदर रगरग में भरा है कि चाहे दलित और पिछड़े दोनों ही जाति के कहर के शिकार क्यों न रहे हों, पिछड़ों को आज भी यह मंजूर नहीं कि कोई दलित उन की बराबरी करे या उन से रोटीबेटी का नाता जोड़े.

शहरों में यह बात गुपचुप होती है. यदि लड़की को दलित लड़के से प्यार हो जाए, तो उस के घर वाले मारने की नहीं तो मरने की धमकी दे कर लड़की को मजबूर कर देते हैं कि वह नाता तोड़ दे.

यह तो पक्का है कि जब दलित और उस से ऊंची जाति वालों में प्यार होता है, तो दोनों का रहनेखाने का तरीका एक सा होगा. कम ही मामलों में बहुत गरीब का बहुत अमीर से प्यार फलता है. अगर ऐसे में दोस्ती हो भी जाए, तो उसे टूटते देर नहीं लगती. लड़की और लड़के के दोस्त ही पहले दोनों को अपनीअपनी जातियां बता देते हैं और आमतौर पर ऊंची जाति वाले दोस्त नीची जाति वाले लड़के या लड़की से दोस्ती तोड़ लेते हैं.

अगर दोस्तों की अड़चन पार कर के प्यार करने वाले आगे बढ़ जाएं, तो भी मुसीबतें कम नहीं होतीं. अगर दोनों कमाऊ हों तो ही वे अपने फैसले पर टिक सकते हैं. मातापिता के बलबूते तो इस तरह का प्यार टिक ही नहीं पाता.

परिवार के लोग इस तरह के प्यार पर नाकभौं चढ़ाते हैं. अगर लड़की दलित हो तो लड़की के मातापिता को डर लगता है कि उसे प्यार करने वाला पेट से कर के छोड़ न जाए, क्योंकि इस तरह के सैकड़ों मामले हर दलित 40-50 साल का होतेहोते देख चुका होता है. वह जानता है कि ऊंची जाति के लड़के शादी का झांसा दे कर लड़की की इज्जत से खेलते हैं.

अगर उलट होता है तो लड़के के दलित मातापिता खौफ में जीते हैं कि ऊंची जाति वाले उन्हें जीने न देंगे. आज 2017 में भी भारत में कुछ ज्यादा नहीं बदला है और यह दलित अच्छी तरह जानते हैं. पिछड़े भी अगर दलितों पर जोरआजमाइश करते हैं, तो उन के मन में बैठा सवर्णों का खौफ बोल रहा होता है. वे सवर्णों को बताना चाहते हैं कि देखो, हम भी दलितों से कोई नाता नहीं रख रहे, जैसे आप नहीं रखते. सवर्ण उन से खुश हों या न हों, पिछड़ों को एहसास होता है कि उन का कद बढ़ गया है.

पूरे देश में यह बीमारी बराबर सी फैली हुई है. दलितों में आपस में भी ऊंचनीच की तेज सोच रहती है. सरकार की तो उसे सुधारने की जिम्मेदारी है ही नहीं, पर अब ऐसे सामाजिक नेता भी नहीं रह गए जो जाति के जहर की दवा बता सकें. टीवी, इंटरनैट, अखबार सब जातियों का गुणगान करते हैं. 80 साल के सुखदेव रविदास और उस की बूढ़ी पत्नी ने नाती भी खोया और अपनी जिंदगी भी, पर शायद ही कहीं किसी को अफसोस होगा.