सरस सलिल विशेष

1947 के बाद 2017 देश में राजनीति की नई करवट ले रहा है. जैसे 1947 में गोरे शासकों को हटा कर पूरे भारत पर कांग्रेस सरकार ने कब्जा जमा लिया था वैसे ही 2017 में भारतीय जनता पार्टी देश की सत्ता पर कब्जा करने के साथ कई राज्यों की सत्ता पर भी काबिज हो गई है. नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने 3-4 साल की छोटी सी अवधि में जो राजनीतिक सफलता पाई है उस के पीछे इन दोनों की कठिन मेहनत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 50 साल की चेष्टा रही है.

कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अब फिर से खड़ी हो पाएंगी, इस में संदेह है. इन पार्टियों से निकले एकमत वाले अगर भारतीय जनता पार्टी के धार्मिक, सामाजिक व आर्थिक हथियारों की तोड़ निकाल पाएं, तभी यह संभव है. पुराने लेबल अब उसी तरह इतिहास के कूड़ेदान में पहुंच गए हैं जैसे भाजपा के पुराने नेता केवल दिखावटी चेहरे बने हुए हैं.

भाजपा की अपनी खास नीति है और कोई कारण नहीं कि वह उसे देश में लागू क्यों न करें. वह बहुत सी बातें खुल्लमखुल्ला कहती रही है और अब तो उसे पर्याप्त जनसमर्थन भी प्राप्त है. धार्मिक हों या आर्थिक मुद्दे, वह हर तरह के प्रयोग करने में स्वतंत्र है और प्रयोग करेगी, इस में संदेह नहीं. आम जनता चाहे सोच कर या किसी भावना में बह कर उसे समर्थन दिया है तो देश को स्वीकार करना ही होगा.