ड्रग्स और सिगरेट की तरह शराब भी जानलेवा होती है पर शराब के व्यापारियों को इस साजिश में विशेषज्ञता हासिल है कि उन्होंने लगभग सारी दुनिया में इस जानलेवा नशे को रोजमर्रा के जीवन की जरूरत बनवा दिया है. हाल यह है कि भारत जैसे पुरातनपंथी देश में भी बच्चों के जन्मदिन के मौकों पर अब बड़ों को खुलेआम शराब परोसना फैशन या शान नहीं, बल्कि जरूरत समझी जाती है.

आयरलैंड ने शराब के कुप्रभावों के प्रति अपने देशवासियों में जागरूकता फैलाने की मुहिम शुरू की है. वहां शराब के विज्ञापनों पर पाबंदी लगा दी गई है. दुकानों में शराब का सैक्शन अलग बनाया जा रहा है और शराब की बोतल पर हैल्थ वार्निंग का स्टिकर चिपकाया जाना जरूरी कर दिया गया है. शराब न केवल कैंसर, किडनी के रोगों के लिए जिम्मेदार है, बल्कि शराब पी कर गाड़ी चलाने यानी ड्रंक ड्राइविंग करने के कारण दुर्घटना हाने की आशंका प्रबल हो जाती है.

सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में कहा था कि देश में हाईवे के दोनों तरफ 500 मीटर के भीतर शराब की दुकान न हो ताकि सड़क पर वाहन चलाते समय शराब के ठेके ड्राइवरों को ललचाएं नहीं. इस से कोई बड़ा फर्क पड़ा हो, इस का आंकड़ा तो नहीं है पर कम से कम शराब की लटकी बोतलें अब रास्ते में नहीं दिखतीं. कहने वाले कहते रहें कि शराब जोशीला ड्रिंक है पर असल में इस में कुछ भी जोश नहीं है. यह शरीर के लिए किसी तरह भी लाभदायक नहीं.

शराब कंपनियों ने जबरदस्त प्रचार के बल पर इसे घरघर पहुंचाया है. उन्होंने फिल्म कंपनियों को मुफ्त शराब दे कर, उन्हें हर मौके पर शराब की बोतलें खुलवाते दिखा कर, इसे मान्यता दिला दी है. पानी की जगह शराब को पीते दिखा कर शराब कंपनियां भरपूर कमाई कर रही हैं. सरकार चुप है क्योंकि उसे टैक्स मिलता है और सरकारी कर्मचारियों को रिश्वत.

शराब का शिकार इस का सेवन करने वाले ही नहीं, बल्कि उन के परिवार की औरतें और बच्चे भी होते हैं. परिवार की आमदनी शराब में बह जाती है और घर की शांति भी. शराब के चलते दुर्घटना होने या गंभीर बीमारी होने से मौत हो जाए, तो और ही मुसीबत होती है. आयरलैंड की सरकार ने एक एनजीओ के दबाव में अपने देश में अच्छा कदम उठाया है पर शराब कंपनियों से टकराना आसान नहीं है. शराब आज तकरीबन सारी दुनिया में शबाब पर है.

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