सरस सलिल विशेष

15 सितंबर, 2016 को अपने दोनों बेटों को स्कूल भेजने के बाद परमजीत कौर घर के  जरूरी काम निपटा कर बाजार चली गई थी. बाजार से लौटने में उसे दोपहर के 2 बज गए. बाजार से लाया सामान रख कर उस ने मां से पूछा, ‘‘बीजी, अभी बच्चे स्कूल से नहीं आए क्या?’’

‘‘थकीमांदी आई हो, आराम से एक गिलास पानी पियो. बच्चे आते ही होंगे, वे कहां जाएंगे, रास्ते में खेलने लग गए होंगे.’’

‘‘बीजी, गांव के सारे बच्चे आ गए हैं, मेरे ही बेटे कहां रह गए?’’ परेशान परमजीत

कौर ने कहा, ‘‘मैं जरा देख कर आती हूं.’’

परमजीत कौर घर से निकल रही थी, तभी घर के बाहर उस के पिता पाला सिंह मिल गए. बच्चों के स्कूल से न आने की बात सुन कर वह भी परेशान हो उठे. बच्चों की तलाश में परमजीत कौर के साथ वह भी चल पड़े. पाला सिंह और परमजीत कौर ने गांव के लगभग सभी बच्चों से अपने बच्चों के बारे में पूछा, पर कोई भी बच्चा उन के बारे में नहीं बता सका.

बच्चों ने सिर्फ यही बताया था कि स्कूल की छुट्टी होने पर उन्होंने उन्हें देखा तो था, लेकिन उस के बाद वे कहां चले गए, यह किसी को पता नहीं था. बच्चों के न मिलने से परमजीत कौर का बुरा हाल था. किसी अनहोनी के बारे में सोच कर वह फूटफूट कर रो रही थी. स्कूल के अध्यापक सतपाल और प्रिंसिपल जगदीश कुमार ने भी बताया था कि छुट्टी होने तक तो दोनों बच्चे साथसाथ दिखाई दिए थे. लेकिन स्कूल से निकलने के बाद वे किधर गए, उन्हें पता नहीं था.

परमजीत कौर के मन में एक ही सवाल बारबार उठ रहा था कि आखिर उस के बच्चे कहां चले गए? रोरो कर वह सब से पूछ भी यही रही थी. शाम करीब 4 बजे गांव के ही हरप्रीत से पता चला कि उस के दोनों बेटों अंकुशदीप और जशनदीप को एक आदमी अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा कर ले गया था.

वह मोटरसाइकिल सवार कौन था, हरप्रीत यह नहीं बता सका था. उस ने बताया था कि वह अपने मुंह पर काला कपड़ा बांधे था, इसलिए वह उसे पहचान नहीं सका था. कोई अंजान आदमी अपनी मोटरसाइकिल पर दोनों बच्चों को बिठा कर ले गया था, इस का मतलब था कि उन का अपहरण हुआ था.

इतना जानने के बाद समय बेकार करना ठीक नहीं था, इसलिए पाला सिंह बेटी परमजीत कौर, स्कूल के प्रिंसिपल जगदीश कुमार और गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर पुलिस को सूचना देने जिला फाजिल्का के थाना बहाववालापुरा की पुलिस चौकी वजीदपुर भीमा जा पहुंचे.

चौकीप्रभारी मुंशीराम ने उन लोगों की बातें ध्यान से सुनने के बाद थानाप्रभारी तेजेंद्रपाल सिंह के अलावा उच्चाधिकारियों को भी घटना की सूचना दे दी. इस के बाद उन्हीं के निर्देश पर 8 साल के अंकुशदीप सिंह और 6 साल के जशनदीप सिंह के अपहरण का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी.

मुकदमा दर्ज होते ही चौकीप्रभारी मुंशीराम ने शहर से बाहर जाने वाले सभी प्रमुख मार्गों पर नाके लगवा दिए. छोटीबड़ी हर गाड़ी की तलाशी ली जाने लगी. पुलिस अपनी काररवाई कर ही रही थी कि चौकी वजीदपुर भीमा के मुंशी के पास एक फोन आया, जिस में फोन करने वाले ने कहा, ‘‘मैं गुरजंट सिंह बोल रहा हूं. अपने साहब से कह दो कि जिन बच्चों को वे ढूंढ रहे हैं, उन के लिए वे परेशान न हों. बच्चे मेरे पास हैं. यह हमारा आपस के लेनदेन का मामला है, इसलिए आप लोगों को बीच में पड़ने की जरूरत नहीं है.’’

यही बात परमजीत कौर को भी फोन कर के कही गई थी. फोन करने वाले ने उस से कहा था, ‘‘मैं बच्चों का अंकल बोल रहा हूं. तुम ने मुझ से जो 20 हजार रुपए लिए थे, उन्हें दे जाओ और मुझ से शादी कर लो. अगर तुम ने मेरी बात मान ली तो मैं तुम्हारे दोनों बेटों को छोड़ दूंगा. अगर नहीं मानी तो उन के छोटेछोटे टुकड़े कर के कहीं फेंक दूंगा.’’

ये दोनों फोन एक ही नंबर से किए गए थे. पुलिस इस सोच में पड़ गई कि फोन करने वाला सनकी है या फिर बेहद चालाक? कहीं वह पुलिस को अपनी इन बातों में उलझा कर कोई नया खेल तो नहीं खेलना चाहता?

बहरहाल, बच्चों की सुरक्षा बेहद जरूरी थी. इसलिए मुंशीराम ने तुरंत उस नंबर की लोकेशन पता करवाई, जो शहर के बाहरी इलाके सीतोगुन्नो की मिली. सीतोगुन्नो जाने के लिए एक टीम तैयार की गई, जिस में थानाप्रभारी तजेंद्रपाल सिंह ने चौकीप्रभारी मुंशीराम, हैडकांस्टेबल सुखदेव सिंह, रमेश कुमार, दलजीत सिंह, कांस्टेबल सरवन, मक्खन और जगदीप सिंह को शामिल किया.

सीतोगुन्नो गांव के पास एक ऊंची पहाड़ी जैसी जगह थी, जिसे पुलिस टीम ने घेर लिया और गुरजंट की तलाश शुरू कर दी. तलाश करती पुलिस टीम जब एक टीले के पास पहुंची तो वहां झाड़ी के पास दोनों बच्चे जमीन पर अर्द्धबेहोशी की हालत में पड़े दिखाई दिए. दोनों बच्चों के हाथपैर और मुंह को बड़ी बेरहमी के साथ बांधा गया था.

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मुंशीराम ने जल्दी से बच्चों के हाथपैर तथा मुंह खोला और उन्हें बहाववालापुरा के अस्पताल पहुंचाया. बाकी पुलिस टीम गुरजंट की तलाश में वहीं जमी रही. लेकिन गुरजंट भाग गया था, क्योंकि काफी तलाश के बाद भी वह वहां नहीं मिला था. इस की वजह यह थी कि वह काफी ऊंचाई पर था, जिस से उस ने पुलिस को आते देख लिया होगा.

बहरहाल, थोड़ी देखभाल के बाद दोनों बच्चे स्वस्थ हो गए थे. मुंशीराम ने अंकुशदीप और जशनदीप को सकुशल परमजीत कौर के हवाले कर दिया. अब उन्हें पता करना था कि गुरजंट कौन था और उस ने परमजीत कौर के बेटों का अपहरण क्यों किया था?

मुंशीराम ने गुरजंट की गिरफ्तारी के प्रयास तेज कर दिए. आखिर उन की मेहनत रंग लाई और पैसों की कमी से परेशान हो कर अपने किसी दोस्त से पैसे लेने बसअड्डे के पास आए गुरजंट को मुखबिर की सूचना पर उन्होंने गिरफ्तार कर लिया. उस से और परमजीत कौर तथा उस के पिता पाला सिंह से की गई पूछताछ के बाद बच्चों के अपहरण की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

पाला सिंह जिला फाजिल्का के थाना बहाववालापुरा के गांव हिम्मतपुरा के रहने वाले थे. खेती कर के गुजरबसर करने वाले पाला सिंह की बेटी परमजीत कौर शादी लायक हुई तो उन्होंने सन 2006 में जिला बठिंडा के थाना भुचोमंडी के गांव खुइयां कोठी के रहने वाले रेशम सिंह से उस का विवाह कर दिया. शादी के बाद परमजीत कौर 2 बेटों अंकुशदीप सिंह और जशनदीप सिंह की मां बनी.

भले ही परमजीत कौर की शादी हुए 8 साल हो गए थे और वह 2 बच्चों की मां बन गई थी, लेकिन उस की अपने पति रेशम सिंह से कभी नहीं पटी. वह कमाता तो ठीकठाक था, लेकिन न वह बीवी का खयाल रखता था और न बच्चों का. यही नहीं, शराब पी कर वह हैवान बन जाता था. छोटीछोटी बातों पर क्लेश करते हुए वह मारपीट के लिए उतारू हो जाता था.

रोज की इस क्लेशभरी जिंदगी से तंग आ कर परमजीत कौर अपने दोनों बेटों को ले कर करीब 3 साल पहले सन 2013 में पति का घर छोड़ कर पिता पाला सिंह के घर आ कर रहने लगी. मांबाप को बोझ न लगे, इस के लिए वह पास की ही एक फैक्ट्री में नौकरी करने लगी. नौकरी लगने के बाद उस ने सिविल कोर्ट में तलाक का मुकदमा कर दिया था. बच्चों के भविष्य को ध्यान में रख कर उस ने गांव के सरकारी स्कूल में उन का दाखिला करा दिया था.

सुबह नौकरी पर जाने के बाद बच्चे दोपहर को घर आते थे तो उस की अनुपस्थिति में उन का खयाल उस की मां अमरजीत कौर रखती थीं. परमजीत कौर को पिता के घर रहते लगभग 3 साल हो गए थे. पिछले साल उस की मुलाकात गुरजंट सिंह से हुई, जो जल्दी ही जानपहचान में बदल गई. गुरजंट सिंह भी वहीं काम करता था, जहां परमजीत कौर करती थी. एक साथ, एक ही जगह पर काम करते हुए ही दोनों में जानपहचान हुई थी.

इस के आगे परमजीत कौर ने न कभी कुछ सोचा था और न ही कुछ सोचने की स्थिति में थी. पति से तलाक के बाद आगे क्या करना है, यह उस के पिता को सोचना था. जबकि जानपहचान होते ही गुरजंट सिंह ने परमजीत कौर को ले कर बहुत आगे की सोच ली थी. वह उस से शादी करने के बारे में सोचने लगा था. एक दिन उस ने यह बात परमजीत कौर से कह भी दी.

परमजीत कौर नेक, शरीफ और धैर्यवान औरत थी. उस ने गुरजंट सिंह को प्यार से समझाते हुए कहा था, ‘‘हम एक साथ काम करते हैं, उठतेबैठते हैं और खातेपीते हैं, यह तो ठीक है? लेकिन रही शादी की बात तो यह न मुझे अच्छी लगती है और न मैं इस बारे में सोचना चाहती हूं.’’

‘‘तो क्या तुम पूरी जिंदगी बिना पति के गुजार दोगी?’’

‘‘यह मेरी समस्या है और इस का समाधान ढूंढना मेरे मातापिता की जिम्मेदारी है, इसलिए तुम्हें इस की चिंता करने की जरूरत नहीं है.’’ परमजीत कौर ने साफसाफ कह दिया.

कहने को तो परमजीत कौर ने गुरजंट को बड़े सभ्य तरीके से समझा दिया था, लेकिन वह अपनी आदत से बाज नहीं आया. वह जब भी परमजीत कौर से मिलता, शादी की ही बात करता. यही नहीं, अब वह आतेजाते परमजीत कौर से छेड़छाड़ भी करने लगा था.

बात जब हद से आगे बढ़ने लगी तो एक दिन परमजीत कौर ने सारी बातें अपने पिता पाला सिंह को बता कर गांव में पंचायत बुला ली. पंचायत ने गुरजंट और उस के पिता हरपाल सिंह को बुलवा लिया.

गुरजंट सिंह जिला श्रीमुक्तसर साहिब के थाना लंबी के गांव भाटीवाला का रहने वाला था. पंचायत ने जब गुरजंट सिंह को उस के पिता के सामने बहूबेटियों को छेड़ने के आरोप में सजा देने की बात की तो उस के पिता ने हाथ जोड़ कर माफी मांगी और वचन दिया कि भविष्य में गुरजंट कभी इस गांव के आसपास भी दिखाई नहीं देगा. उसी दिन हरपाल सिंह गुरजंट को ले कर गांव चला गया. यह जुलाई, 2016 की बात है.

उस दिन के बाद गुरजंट सिंह परमजीत कौर को तो क्या, गांव के भी किसी आदमी को दिखाई नहीं दिया. 3 महीने बाद अचानक गांव आ कर उस ने बड़ी होशियारी से परमजीत कौर के दोनों बेटों का अपहरण कर लिया, ताकि उस पर दबाव डाल कर वह उस से शादी कर सके.

पूछताछ के बाद मुंशीराम ने इस मुकदमे में अपहरण के साथ षडयंत्र की धारा को जोड़ कर गुरजंट सिंह को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

इस के बाद गुरजंट के पिता हरपाल सिंह ने गांव में पंचायत बुला कर परमजीत कौर और गांव वालों से माफी मांगते हुए कहा कि वे एक बार फिर गुरजंट को माफ कर दें. लेकिन अब क्या हो सकता था. अब तो मामला पुलिस और न्यायालय तक पहुंच चुका था. उस ने जो किया था, उस की सजा तो उसे भोगनी ही पड़ेगी.