सरस सलिल विशेष

इसी मार्च महीने के तीसरे सप्ताह में लगे 2 बड़े झटकों ने वन्यजीव प्रेमियों को हिला कर रख दिया. दोनों झटके राजस्थान में केवल 24 घंटे के अंतराल पर लगे. विश्वप्रसिद्ध सरिस्का अभयारण्य में एक बाघ की फंदे में फंसने से मौत हो गई. इस के अगले ही दिन रणथंभौर अभयारण्य का एक बाघ पास के एक गांव में घुस गया. ग्रामीणों की सूचना पर पहुंचे वन विभाग के कर्मचारियों ने उसे बेहोश कर पकड़ने के लिए ट्रैंकुलाइज किया, लेकिन बाघ बेहोशी की दवा का असर नहीं झेल सका और उस की मौत हो गई.

सरिस्का में फरवरी के चौथे सप्ताह से बाघिन एसटी-5 लापता चल रही थी. इस बाघिन की तलाश में वन विभाग के कर्मचारी दिनरात ट्रैकिंग कर रहे थे. इसी दौरान 19 मार्च, 2018 की रात करीब 9 बजे सरिस्का अभयारण्य की सदर रेंज के इंदौक इलाके में कालामेढ़ा गांव के एक खेत में बाघ का शव पड़ा होने की सूचना मिली.

इस सूचना पर सरिस्का मुख्यालय के अफसर मौके पर पहुंचे और बाघ केशव के शव को कब्जे में ले लिया. उस की गरदन क्लच वायर द्वारा बनाए गए फंदे में फंसी हुई थी. वह 4 साल के जवान नर बाघ एसटी-11 का शव था. इस बाघ की मौत कुछ घंटों पहले ही हुई थी. जिस खेत में उस की लाश मिली थी, वह खेत भगवान सहाय प्रजापति का था. वन अधिकारियों ने खेत मालिक को हिरासत में ले लिया. भगवान सहाय ने वन अधिकारियों को बताया कि फसलों को नीलगायों और दूसरे जंगली जानवरों से बचाने के लिए उस ने खेत में ब्रेक वायर जैसा तार लगा रखा था. खेत की तरफ आने पर बाघ फंदे में उलझ गया होगा और फंदे से निकलने की जद्दोजहद में तार से उस का गला घुट गया होगा, जिस से उस की मौत हो गई.

जिस जगह बाघ एसटी-11 का शव मिला, वह इलाका बाघिन एसटी-3 के लापता होने वाली जगह से कुछ ही दूर है. कुछ दिनों पहले बाघिन एसटी-5 और बाघ एसटी-11 सरिस्का की अकबरपुर रेंज में साथसाथ देखे गए थे. इन के पगमार्क और लोकेशन साथ मिले थे.

उस के बाद से बाघिन एसटी-5 लापता हो गई थी, लेकिन बाघ एसटी-11 के रेडियो कौलर के सिगनल लगातार मिल रहे थे. बाघ एसटी-11 सरिस्का अभयारण्य का पहला शावक था. उस का जन्म रणथंभौर से लाई गई बाघिन एसटी-2 से करीब 4 साल पहले हुआ था.

बाघ का शव मिलने के दूसरे दिन 20 मार्च को जयपुर से वन विभाग के आला अफसर और देहरादून से भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक सरिस्का पहुंच गए. सरिस्का प्रशासन और देहरादून से आए वैज्ञानिकों ने कालामेढ़ा पहुंच कर बाघ की मौत से जुड़े साक्ष्य जुटाए. हिरासत में लिए गए खेत मालिक की निशानदेही पर तार का फंदा और बाघ के बाल आदि बरामद किए गए.

बाद में सरिस्का मुख्यालय पर बाघ के शव का पोस्टमार्टम कराया गया. इसी दिन अधिकारियों और वन्यजीव प्रेमियों की मौजूदगी में बाघ के शव को जला दिया गया. वन विभाग ने बाघ की मौत के मामले में खेत के मालिक भगवान सहाय प्रजापति को विधिवत गिरफ्तार कर लिया.

हैरानी की बात यह रही कि राज्य के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक डा. जी.वी. रेड्डी ने पूरे मामले की जांच से पहले ही आरोपी किसान को बेकसूर बताते हुए कहा कि उस ने खेत में फसल बचाने के लिए फंदा लगाया था, जिस में फंस कर बाघ मारा गया. किसान ने खुद वन विभाग को बाघ के मरने की सूचना दी थी. फिर भी हम इस बात की जांच करेंगे कि क्या वह आदतन फंदा लगाता रहा है.

यह दुखद रहा कि जिस समय सरिस्का में बाघ एसटी-11 के अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी, उसी समय सरिस्का से करीब 250 किलोमीटर दूर रणथंभौर अभयारण्य में 6 साल के नर बाघ टी-28 की मौत हो गई. वह करीब 13 साल का था.

मारा गया जंगल का राजा

करीब 6 साल तक इस बाघ का रणथंभौर अभयारण्य के जोन-3 में एकछत्र राज था. जंगल के इस राजा ने साढ़े 4 साल की उम्र में बूढ़े बाघ टी-2 को भिडंत में हरा कर इस इलाके पर कब्जा जमाया था. उस दौरान दूसरे जवान बाघों ने इस इलाके पर अपना कब्जा करने के लिए टी-28 को चुनौती दी थी लेकिन वह किसी बाघ से नहीं डरा. करीब डेढ़दो साल पहले जवान बाघ टी-57 ने उसे जोन-3 से खदेड़ दिया था. इस के कुछ दिन बाद बाघ टी-86 ने उसे जंगल से बाहर का ही रास्ता दिखा दिया था.

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करीब 13 साल से ज्यादा उम्र का होने के कारण बाघ टी-28 अभयारण्य में जवान बाघों का मुकाबला नहीं कर सका. वह इधरउधर भटकने लगा था. कभी जंगल तो कभी खेतों तो कभी नालों में रह कर वह अपनी जिंदगी के दिन काट रहा था. उम्र ज्यादा होने की वजह से अब उस के लिए जंगल में शिकार करना भी मुश्किल हो गया था.

उस दिन यानी 20 मार्च, 2018 को सुबह करीब 9 साढ़े 9 बजे बाघ टी-28 भोजन की तलाश में खंडार रेंज से निकल कर छाण गांव के पास खेतों में आ गया. बाघ को देख कर आसपास के ग्रामीणों की भीड़ वहां जमा हो गई. लोगों ने उसे घेरने के बाद वन विभाग को सूचना दे दी. इस बीच लगातार भागदौड़ कर रहे इस बाघ के हमले से जैतपुर गांव का अहसर और छाण गांव का लईक जख्मी हो गए. इलाज के लिए उन्हें अस्पताल भेज दिया गया.

लोगों की सूचना पर वन विभाग के अफसर और कर्मचारी छाण गांव में मौके पर पहुंच गए. वन अधिकारियों ने पहचान लिया कि खेत में घुसा हुआ बाघ टी-28 है. अफसरों ने ग्रामीणों को समझाया कि बाघ खुद ही जंगल में चला जाएगा, लेकिन ग्रामीण अधिकारियों पर उस बाघ को पकड़ने का दबाव डाल रहे थे. हालात ऐसे थे कि बाघ चारों ओर से घिरा हुआ था. ऐसे में वह आतंकित होने के साथ खुद के बचाव का रास्ता भी ढूंढ रहा था. इस स्थिति में आक्रामक हो कर वह ग्रामीणों पर हमला भी कर सकता था.

ग्रामीणों के दबाव में वन अफसरों ने बाघ को ट्रैंकुलाइज कर बेहोश करने के लिए सवाई माधोपुर से टीम बुलाई. दोपहर करीब 12 बजे मौके पर पहुंची टीम ने अपनी काररवाई शुरू की. दोपहर करीब पौने एक बजे टीम ने निशाना साध कर एक बार में ही बाघ को ट्रैंकुलाइज कर बेहोश कर दिया.

कुछ देर इंतजार करने के बाद वन अफसरों की टीम बाघ के पास पहुंची तो वह बेहोश मिला. वन विभाग की टीम ने बेहोश बाघ को पिंजरे में डाला. इस के बाद टीम वापस जाने लगी तो ग्रामीणों ने वन विभाग की गाड़ी रोक ली. ग्रामीणों ने बाघ के कारण खेत में हुए नुकसान की भरपाई करने के बाद ही बाघ को वहां से ले जाने देने की बात कही.

इस बात पर विवाद हो गया. वन कर्मचारियों ने पैसा देने में अपनी मजबूरी बताई तो गुस्से में ग्रामीणों ने वन विभाग की टीम पर पथराव शुरू कर दिया. इस बीच वन विभाग के अफसरों ने फोन कर के किसी से उधार पैसे मंगाए और 2 खेत मालिकों को उन की फसल के नुकसान की भरपाई के रूप में 30-30 हजार रुपए नकद दे दिए.

इस के बाद ग्रामीणों ने वन विभाग की टीम को जाने की इजाजत दी. वन कर्मचारियों ने गांव से निकलते समय पिंजरे में बंद बाघ टी-28 की जांच की तो पता चला कि उस की सांसें थम चुकी थीं. बाद में उसी दिन बाघ के शव का पोस्टमार्टम कराने के बाद उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

बाघों की मौत पर सवाल

2 दिन में 2 बाघों की मौत से राजस्थान में बाघों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए. पूरा वन विभाग हिल गया. राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने इन बाघों की मौत पर दुख जताते हुए कहा कि देश में बढ़ती आबादी और जंगलों में अतिक्रमण के कारण बाघों की मौत हो रही है. जंगलों से गांव स्थानांतरित नहीं हो पा रहे हैं.

सरिस्का में बाघ एसटी-11 से कुछ दिन पहले ही देश भर में टाइगर रिजर्व पर नजर रखने वाली बौडी नैशनल टाइगर कंजरवेशन अथौरिटी यानी एनटीसीए के चीफ डा. देवब्रत ने सरिस्का का दौरा करने के बाद राज्य सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी थी. इस रिपोर्ट में कहा गया कि जब तक सरिस्का टाइगर रिजर्व में अतिक्रमण और अन्य गैरकानूनी गतिविधियां होती रहेंगी तथा पर्याप्त स्टाफ नहीं होगा, तब तक बाघ खतरे में रहेंगे.

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रणथंभौर के बाघ टी-28 की मौत के सिलसिले में 21 मार्च को सवाई माधोपुर जिले के खंडार पुलिस थाने में फलौदी रेंजर तुलसीराम ने एक रिपोर्ट दर्ज कराई. 21 लोगों के नामजद और लगभग 100 अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज कराई रिपोर्ट में बाघ को टैं्रकुलाइज कर लाते समय सरकारी वाहन पर पथराव कर तोड़फोड़ करने और राजकीय कार्य में बाधा डालने का आरोप लगाया गया. उन्होंने रिपोर्ट में कहा कि यदि टैं्रकुलाइज किए बाघ को इतनी देर तक नहीं रोका जाता तो उस की जान बचाई जा सकती थी.

21 मार्च को ही सवाई माधोपुर में पथिक लोक सेवा समिति और कंज्यूमर रिलीफ सोसायटी के कार्यकर्ताओं ने कलेक्टरेट पर प्रदर्शन कर कलेक्टर को प्रधानमंत्री के नाम एक ज्ञापन दिया. उन्होंने बाघ की मौत की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की. ज्ञापन में वन विभाग पर ट्रैंकुलाइज करने में लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा गया कि वन विभाग के पास बाघों को ट्रैंकुलाइज करने के लिए विशेषज्ञ नहीं हैं. ऐसे में अयोग्य वनकर्मियों से बाघों को ट्रैंकुलाइज कराया जा रहा है.

नैशनल टाइगर कंजरवेशन अथौरिटी यानी एनटीसीए ने घटना के 2 दिन बाद ही टी-28 की मौत के संबंध में राज्य के वन विभाग से रिपोर्ट मांग ली. इस में बाघ की उम्र, उस की मौत के कारण, पोस्टमार्टम रिपोर्ट आदि सभी तथ्यात्मक जानकारियां मांगी गईं.

दूसरी तरफ सरिस्का में बाघ एसटी-11 की मौत के सिलसिले में की गई जांच में संगठित गिरोह के शामिल होने की आशंका जताई जा रही है. इस में सरिस्का अभयारण्य  में पर्यटकों को घुमाने वाले जिप्सी चालकों के शामिल होने का भी संदेह है.

वन विभाग ने गिरफ्तार भगवान सहाय प्रजापति से पूछताछ के आधार पर लीलूंडा गांव में एक मकान से बंदूक, तलवार व सांभर आदि के सींग भी बरामद किए.

इस के अलावा अन्य जगहों से भी टोपीदार बंदूकें बरामद की गईं. इन आरोपियों के खिलाफ वन विभाग ने वन्यजीव अधिनियम की धाराओं के तहत काररवाई न कर के मालाखेड़ा पुलिस थाने में आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया.

पुलिस ने आर्म्स एक्ट में इंदौक गांव के बिल्लूराम मीणा, हरिकिशन मीणा व त्रिलोक मीणा और लीलूंडा गांव के रतनलाल गुर्जर को गिरफ्तार किया. हालांकि इन की गिरफ्तारी भगवान सहाय प्रजापति से पूछताछ में मिली जानकारी के आधार पर की गई थी. वन विभाग अभी बाघ एसटी-11 की मौत के मामले की जांच कर रहा है.

फरवरी के चौथे सप्ताह से लापताबाघिन एसटी-5 के शिकार की भी आशंका जताई जा रही है. बाघिन का कोई सुराग नहीं मिलने पर एनटीसीए ने प्रोटोकोल के अनुसार सरिस्का प्रशासन को आदेश दिए हैं कि इस बाघिन के जीवित या मरने की पुष्टि की जाए.

दरअसल, बाघ कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. चाहे राजस्थान का रणथंभौर हो या सरिस्का अभयारण्य हो अथवा देश का कोई अन्य अभयारण्य. सभी अभयारण्यों की अपनी समस्या है.

असुरक्षित हैं शरणस्थली

राजस्थान में बाघों की शरणस्थली के रूप में मुख्यरूप से 2 अभयारण्य हैं, रणथंभौर और सरिस्का. इन दोनों बाघ परियोजनाओं को स्थापित हुए करीब 4 दशक बीत चुके हैं. सरिस्का सन 2000 तक कार्बेट नेशनल पार्क के बाद बाघों का सब से सुरक्षित अभयारण्य माना जाता था.

इस के बावजूद वन विभाग के अफसरों की लापरवाही से सक्रिय हुए शिकारियों ने सरिस्का अभयारण्य से बाघों का सफाया कर दिया. सन 2005 में सरिस्का के बाघ विहीन होने की बात सामने आई. तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के निर्देश पर इस मामले की सीबीआई ने भी जांच की थी.

जिला अलवर और जयपुर जिले के कुछ हिस्से तक करीब 1200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले सरिस्का टाइगर रिजर्व को तत्कालीन मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक और बाद में राजस्थान के हैड औफ फोरेस्ट फोर्स बने आर.एन. मेहरोत्रा के प्रयासों से फिर बाघों से आबाद करने की कार्ययोजना बनाई गई.

मेहरोत्रा ने इस काम में वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट औफ इंडिया का सहयोग लिया. डब्ल्यूआईआई और मेहरोत्रा के प्रयासों से 28 जून, 2008 को भारत में बाघ का पहला ट्रांसलोकेशन किया गया.

इस में रणथंभौर अभयारण्य से बाघ को ट्रैंकुलाइज कर भारतीय वायुसेना के हेलीकौप्टर से सरिस्का अभयारण्य ला कर छोड़ा गया था. इस के बाद समयसमय पर रणथंभौर से 2 नर और 2 मादा बाघों को ला कर सरिस्का में छोड़ा गया.

इस तरह सरिस्का अभयारण्य में बाघों का पुनर्वास कर वंशवृद्धि की कवायद शुरू की गई. हालांकि भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे आर.एन. मेहरोत्रा के प्रयास फलीभूत होने लग गए थे, लेकिन सब से पहले लाए गए नर बाघ की नवंबर 2010 में पायजनिंग से मौत हो गई. अब बाघ एसटी-11 की संदिग्ध तरीके से मौत हो गई.

बाघिन एसटी-5 फरवरी के तीसरे सप्ताह से लापता चल रही थी. फिलहाल सरिस्का में 11 बाघबाघिन हैं. इन में भी 2 किशोर उम्र के शावक हैं. इन के अलावा 7 शावक हैं. सरिस्का अभयारण्य का क्षेत्रफल काफी लंबाचौड़ा होने से यहां बाघ के दर्शन बड़ी मुश्किल से हो पाते हैं.

राजकुमार के नाम से जाने जाने वाले सरिस्का के बाघ एसटी-11 की मौत के बाद बाघों की वंशवृद्धि पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.

सरिस्का में फिलहाल बाघिनों के मुकाबले बाघों की संख्या कम है. नर बाघों में जवान बाघ 2 ही हैं. अब इन्हीं पर सरिस्का में बाघों की वंशवृद्धि की उम्मीद टिकी हुई है. सरिस्का में पिछले ढाई साल से नया शावक नजर नहीं आया है.

सरिस्का में बाघों का कुनबा लगातार बढ़ रहा है. बाघबाघिनों की नई खेप अब अपने लिए नए ठिकाने तलाश रही है. इस के लिए वे आसपास के जंगलों में चले जाते हैं.

दूसरी ओर रणथंभौर से निकल कर जवान होते बाघ अपनी विचरणस्थली करौली और दौसा जिले में भी बना रहे हैं. कुछ बाघबाघिन सवाई माधोपुर जिले की सीमाएं पार कर बूंदी और कोटा होते हुए जंगल के कारीडोर से हो कर पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश तक पहुंच गए हैं. रणथंभौर से 2-2 बाघबाघिनों को अब सरिस्का और नए बनाए गए मुकंदरा अभयारण्य में स्थानांतरित करने के प्रयास भी चल रहे हैं.

संरक्षण के प्रयासों के बावजूद खतरा ही खतरा

सरस सलिल विशेष

राज्य के हैड औफ फोरेस्ट फोर्स से सेवानिवृत्त अधिकारी आर.एन. मेहरोत्रा का कहना है कि रणथंभौर में बाघ की मौत मैनेजमेंट की काररवाई की वजह से हुई. रणथंभौर में 5 साल में सब से ज्यादा व्यवहारिक गतिविधियां बढ़ी हैं. वहां कानून व्यवस्था बिगाड़ने का काम हुआ है. वन कानूनों की खुली धज्जियां उड़ाई जा रही हैं.

दूसरी तरफ सरिस्का में विभागीय अधिकारी वन्यजीवों के संरक्षण में जुटे हैं, लेकिन किसान अपनी फसलों को वन्यजीवों से बचाने के लिए कानून के विपरीत फंदे लगा कर जानवरों को फांसने का काम कर रहे हैं. इसे कठोरता से रोकना जरूरी है. सरिस्का में भी अवैध कब्जे बढ़ाने की कोशिशें हो रही हैं, इन्हें सख्ती से नहीं रोका गया तो भविष्य में रणथंभौर जैसी स्थिति हो सकती है.

वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट औफ इंडिया के मुताबिक सन 2004 में हुई गणना में देश भर में 1411 बाघ थे. सरकार के प्रयासों से सन 2011 में बाघों की तादाद बढ़ कर 1706 हो गई. सन 2014 में फोटोग्राफिक डाटा बेस के आधार पर देश भर में 2226 बाघ गिने गए. यह संख्या दुनिया भर के बाघों की संख्या का करीब 70 फीसदी थी. दुनिया भर में बाघों की फिलहाल कुल संख्या लगभग 3890 है.

सन 2017 देश में बाघों के लिए संकट का साल रहा. इस दौरान देश भर में 115 बाघों की मौत हई. नैशनल टाइगर कंजरवेशन अथौरिटी की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल देश में 98 बाघों के शव और 17 बाघों के अवशेष बरामद किए गए. इन में से 32 मादा और 28 नर बाघों की पहचान हो सकी.

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बाकी मृत बाघों की पहचान नहीं हो सकी. बाघों की मौत के मामले में मध्य प्रदेश का नाम पहले नंबर पर आता है. वहां 29 बाघों की मौत हुई.

इस के अलावा महाराष्ट्र में 21, कर्नाटक में 16, उत्तराखंड में 16 और असम में 16 बाघों की मौत दर्ज की गई. बाघों की मौत के पीछे करंट लगना, शिकार, जहर, आपसी संघर्ष, प्राकृतिक मौत, ट्रेन या सड़क हादसों को कारण बताया गया. पिछले 5 सालों में 414 बाघों की मौत के मामले सामने आए हैं. इन में सन 2013 में 63, सन 2014 में 66, सन 2015 में 70, सन 2016 में 100 और 2017 में 115 मामले शामिल हैं.

बाघों के संरक्षण के लिए सरकार ने सन 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया था. तब से ले कर अब तक देश में 50 टाइगर रिजर्व बनाए गए हैं, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 2.12 प्रतिशत है. सन 2014 के बाद इस साल फिर देश भर में बाघों की गणना की जाएगी.

इस बार गणना में परंपरागत तरीकों के अलावा हाईटेक तरीके का भी इस्तेमाल किया जाएगा. इस के लिए वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट औफ इंडिया ने एक ऐप डेवलप किया है. इसे मौनिटरिंग सिस्टम फौर टाइगर इंटेंसिव प्रोटेक्शन ऐंड इकोलौजिकल स्टेटस या एम स्ट्राइप्स नाम दिया गया है.

बहरहाल, जंगलों में बढ़ते मानवीय दखल, कटाई, चराई, स्वच्छंद विचरण का दायरा घटने से बाघों पर संकट मंडरा रहा है. इन के अलावा सब से बड़ा संकट शिकारियों का है. बेशकीमती खाल और अवशेषों से यौन उत्तेजक दवाएं बनाने वालों की निगाहें हमेशा बाघों पर टिकी रहती हैं. इसी कारण बाघ बेमौत मारे जा रहे हैं.

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