सरस सलिल विशेष

70 वर्षीय जी.के. नायर एयरफोर्स की सिविल विंग से रिटायर हो कर चाहते तो अपने गृह राज्य केरल वापस जा सकते थे, लेकिन लंबा वक्त एयरफोर्स में गुजारने के बाद उन्होंने मध्य प्रदेश में ही बस जाने का फैसला ले लिया था. इन दिनों वह अपनी 68 वर्षीय पत्नी गोमती नायर सहित भोपाल खजूरीकलां स्थित नर्मदा ग्रीन वैली कालोनी में डुप्लेक्स बंगले में रह रहे थे. इस कालोनी की गिनती भोपाल की पौश कालोनियों में होती है, जिस में संपन्न और संभ्रांत लोग रहते हैं.

दूसरे रिटायर्ड मिलिट्री अफसरों की तरह जी.के. नायर का स्वभाव भी अनुशासनप्रिय था, जो आम लोगों को सख्त लगता था. उन के चेहरे पर छाया रौब और बातचीत का लहजा ही उन के एयरफोर्स अधिकारी होने का अहसास करा देता था. साल 2014 में जब वे पत्नी सहित नर्मदा ग्रीन वैली में आ कर रहने लगे थे, तभी से इस कालोनी के अधिकांश लोग उन के स्वभाव से परिचित हो गए थे.

गोमती नायर ग्वालियर के मुरार अस्पताल में नर्स पद से रिटायर हुई थीं. पतिपत्नी दोनों को ही पेंशन मिलती थी. नौकरी में रहते ही नायर दंपति अपनी तीनों बेटियों की शादियां कर के अपनी इस जिम्मेदारी से मुक्त हो चुके थे. लिहाजा उन के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी.

ग्वालियर से नायर दंपति का खास लगाव था, क्योंकि गोमती वहीं से रिटायर हुई थीं और इन की बड़ी बेटी प्रशुंभा नायर की शादी भी ग्वालियर में ही हुई थी. गोमती की एक बहन भी ग्वालियर में ही रहती थीं. जब भी इन दोनों का मन भोपाल से कहीं बाहर जाने का होता था तो उन की प्राथमिकता ग्वालियर ही होती थी.

पुरसुकून थी नायर दंपति की जिंदगी

भोपाल में बसने की बड़ी वजह उन की यहां फैली रिश्तेदारी थीं. मंझली बेटी प्रियंका नायर की शादी भोपाल में हुई थी और वह अवधपुरी इलाके की फर्स्ट गार्डन कालोनी में रहती थीं. प्रियंका एक नामी प्राइवेट स्कूल में टीचर थीं. छोटी बेटी प्रतिभा की भी शादी भोपाल में हुई थी, जो मिसरोद इलाके की राधाकृष्ण कालोनी में रहती थी. गोमती के बड़े भाई का बेटा प्रमोद नायर भी भोपाल में रहता था.

उन की और 2 बहनें भी भोपाल में रहती थीं. इतने सारे नजदीकी रिश्तेदारों के भोपाल में होने के चलते जी.के. नायर का भोपाल में बस जाने का फैसला स्वाभाविक था, जो उन्हें एक सामाजिक सुरक्षा का अहसास कराता था. हर रविवार कोई न कोई मिलने के लिए उन के घर आ जाता था. इस से बुजुर्ग दंपति का अपनों के बीच अच्छे से वक्त कट जाता था. जी.के. नायर के बैंक खातों का काम और पैसों का हिसाबकिताब प्रियंका के हाथ में था.

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नर्मदा ग्रीन वैली कालोनी में शिफ्ट होने के कुछ दिन बाद ही जी.के. नायर सोसायटी के अध्यक्ष चुन लिए गए थे. लेकिन इस पद पर वे सभी की पसंद नहीं थे. कालोनियों की सोसाइटियों की अपनी एक अलग राजनीति होती है, जिस का अंदाजा या तजुर्बा जी.के. नायर को नहीं था. अध्यक्ष रहते उन्होंने कालोनी के पार्क में बेंच लगवाने की पहल की तो कई सदस्यों ने इस पर असहमति जताई थी, जिस से खिन्न हो कर उन्होंने पद छोड़ दिया था.

वजह यह कि काम कम होता था और रोजाना की चिखचिख ज्यादा होती थी. 70 साल की बड़ी और लंबी जिंदगी में हालांकि इन छोटीमोटी बातों के कोई खास मायने नहीं होते, लेकिन यह साबित हो गया था कि मिलिट्री से रिटायर्ड अधिकारी आमतौर पर समाज में फिट नहीं होते.

पतिपत्नी खाली समय ज्यादातर टीवी देख कर गुजारते थे. गोमती को अपराध से संबंधित धारावाहिक पसंद थे. इन्हें वे बड़े चाव से देखा करती थीं और अपराध और अपराधी की मानसिकता को समझने की कोशिश करती रहती थीं. कई बार ये धारावाहिक देख कर उन्हें अपनी सुरक्षा का ध्यान आता था, पर यह सोच कर वे निश्चिंत हो जाया करती थीं कि उन की कालोनी कवर्ड है और मकान भी सुरक्षित है. बुढ़ापे में सुरक्षा की चिंता एक आम बात है लेकिन जी.के. नायर बहादुर होने के कारण यह चिंता नहीं करते थे.

अचानक कैसे आई कालरात्रि

8 मार्च की रात टीवी देखते समय जी.के. नायर ने गोमती से कुछ बातें की थीं, फिर लगभग साढ़े 9 बजे उन्होंने प्रियंका को फोन किया. वैसे तो सभी रिश्तेदारों खासतौर से बेटियों से उन की रोजाना फोन पर बात हो जाती थी, लेकिन प्रियंका को उन्होंने इस वक्त एक खास मकसद से फोन किया था.

उन्होंने बेटी से कहा कि वह अगले दिन या फिर जब भी बर्थ खाली मिले, उन दोनों का ग्वालियर जाने का रिजर्वेशन करवा दे. क्योंकि उन्हें प्रियंका की मौसी यानी गोमती की बहन को देखने जाना था, जो इन दिनों बीमार चल रही थीं.

9 मार्च की सुबह रोजाना की तरह जब नायर दंपति के यहां काम करने वाली नौकरानी  मोहनबाई आई तो कई बार कालबेल बजाने के बाद भी दरवाजा नहीं खुला. इस पर मोहनबाई ने पहले उन्हें आवाजें लगाईं और फिर जी.के. नायर के मोबाइल पर फोन किया. लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं मिला.

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दरवाजे पर खड़ेखड़े मोहनबाई को ध्यान आया कि पिछली रात ही गोमती ने उस से जल्द आने को कहा था और 5 के बजाय 10 रोटियां बनवाई थीं, जिस से उस ने अंदाजा लगाया था कि शायद रात को कोई आने वाला है.

जब फोन नहीं उठा तो मोहनबाई पड़ोस में रहने वाली रत्ना मिस्त्री के पास गई और उन्हें यह बात बताई. इस पर रत्ना ने भी नायर साहब का मोबाइल फोन लगाया पर दूसरी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला. यह एक चिंता की बात थी. नायर दंपति द्वारा फोन न उठाए जाने की बात रत्ना ने दूसरे पड़ोसियों को बताई तो धीरेधीरे कालोनी के लगभग सभी लोग इकट्ठा हो गए. किसी अनहोनी की आशंका सभी के दिमाग में थी, पर कोई खुल कर नहीं बोल पा रहा था.

सुबहसुबह जी.के. नायर के घर के बाहर जमा भीड़ देख कर एक और पड़ोसी पी.वी.आर. रामादेव भी जिज्ञासावश वहां पहुंच गए. रामादेव खुद आर्मी में सूबेदार रह चुके थे, इसलिए नायर दंपति से उन की अच्छी पटरी बैठती थी. पूछने पर पता चला कि नायर दंपति के घर का दरवाजा नहीं खुल रहा है और वे फोन भी नहीं उठा रहे हैं. इस पर उन्होंने पहल की और नायर के बंगले से सटे हरिदास मिस्त्री के बंगले की बालकनी से नायर के घर जा पहुंचे.

जी.के. नायर के घर का दृश्य देख कर रामादेव हतप्रभ रह गए. जी.के. नायर और गोमती नायर की लाशें फर्श पर पड़ी थीं. यह बात उन्होंने वहां मौजूद लोगों को बताई तो मानो सन्नाटा फैल गया. कालोनी में ऐसी किसी वारदात की उम्मीद किसी ने सपने में भी नहीं सोची थी. एक व्यक्ति ने इस की सूचना 100 नंबर पर दी और  लोग पुलिस के आने का इंतजार करने लगे. मोहनबाई भी सहमी सी एक तरफ खड़ी थी.

आधे घंटे से कम में अवधपुरी पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई. चूंकि नायर के घर का दरवाजा अंदर से बंद था, इसलिए पुलिस वालों को भी नायर के एक और पड़ोसी आदित्य मिश्रा के घर से हो कर अंदर जाना पड़ा. पुलिस बल को यह बात भीड़ में से कोई बता चुका था कि नायर साहब छत का दरवाजा हमेशा बंद रखते थे.

मामला चूंकि एयरफोर्स के रिटायर अफसर की हत्या का था, इसलिए देखते ही देखते अवधपुरी इलाके के अलावा गोविंदपुरा और अयोध्यानगर थानों से भी पुलिस वाले पहुंच गए. पुलिस बल के साथ डीआईजी धर्मेंद्र चौधरी और एसपी राहुल लोढ़ा भी थे.

रिश्तेदारों की मौजूदगी में हुई पुलिस जांच

नायर दंपति की लाशें पहली मंजिल के बैडरूम में आमनेसामने पड़ी थीं. गले से बहता खून बयां कर रहा था कि हत्या गला रेत कर की गई थी. पुलिस वालों ने जब बारीकी से पूरे घर का मुआयना किया तो मामला कहीं से भी चोरी या लूटपाट का नहीं लगा. घर का सारा सामान व्यवस्थित तरीके से रखा हुआ था.

अब तक मातापिता की हत्या की खबर बेटियों को भी लग चुकी थी, लिहाजा प्रियंका और प्रतिभा जिस हालत में थीं, उसी हालत में नर्मदा वैली कालोनी की तरफ निकल पड़ीं.

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पुलिस छानबीन और पूछताछ में जुट गई थी. मोहनबाई, रत्ना मिस्त्री और पी.वी.आर. रामादेव के बयानों से केवल घटना की जानकारी मिल रही थी, हत्यारे की नहीं.

रत्ना मिस्त्री के इस बयान से जरूर पुलिस को कुछ उम्मीद बंधी थी कि रात कोई 12 बजे के आसपास नायर दंपति के घर से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आई थीं, पर उन्होंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया था क्योंकि तेज आवाज में बातचीत करना मृतक दंपति की आदतों में शुमार था.

जी.के. नायर की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी और घर में कोई लूटपाट या चोरी भी नहीं हुई थी. इस का सीधा सा मतलब यह निकल रहा था कि हत्यारा जो भी था, बेहद नजदीकी था, जिस के रात में आने पर मृतकों को कोई ऐतराज नहीं था. न ही उस पर कोई पाबंदी थी.

हत्या के ऐसे मामलों, जिन में मृतक पैसे वाले हों, में उन की जमीनजायदाद और पैसा खास मायने रखता है. इस तरफ भी पुलिस का ध्यान गया. पूरा घर और आसपास का इलाका छानने के बाद भी हत्यारे का कोई सुराग और हथियार नहीं मिला तो पुलिस की जांच का दायरा नायर दंपति के रिश्तेदारों की तरफ बढ़ गया.

इसी बीच प्रियंका आई तो हत्या की गुत्थी सुलझती नजर आई. प्रियंका से पुलिस को पता चला कि दीवाली के दिनों में पटाखे चलाए जाने पर उस के पिता का विवाद सोसायटी के मौजूदा अध्यक्ष अशोक मनोज से हुआ था. अवधपुरी थाने में इस की शिकायत भी दर्ज हुई थी. दूसरी अहम बात यह सामने आई कि प्रियंका ही मांबाप का एकाउंट्स देखती थी.

पुलिस को संदेह का एक नया आधार मिला लेकिन पुलिस वालों को तीसरी बात ज्यादा महत्त्वपूर्ण लगी. दरअसल प्रियंका ने बताया कि इसी साल जनवरी तक आरती नाम की नौकरानी और उस का पति राजू धाकड़ उस के मातापिता के यहां काम किया करते थे. राजू ने अपनी बहन की शादी के लिए उस के पिता से करीब 2 लाख रुपए भी उधार ले रखे थे.

प्रियंका ने बताया कि आरती जब 8 साल की थी, तभी मम्मीपापा ने उसे अपने साथ रख लिया था और उन्होंने ही उस की शादी राजू से करवाई थी. भोपाल आते समय नायर दंपति उन्हें भी साथ ले आए थे. इतना ही नहीं, जी.के. नायर ने अपने एक परिचित हरिदास से कह कर भोपाल के भेल कारखाने में राजू की नौकरी ठेका श्रमिक के रूप में लगवा दी थी.

आरती और राजू पर जी.के. नायर इतने मेहरबान थे कि उन्होंने इन दोनों को खजूरीकलां में रहने के लिए किराए का मकान भी दिलवा रखा था. प्रियंका ने यह भी बताया कि राजू का विवाद अकसर गोमती से हुआ करता था. वह लिए गए पैसे लौटाना तो दूर की बात, जी.के. नायर के नाम पर कुछ दूसरे लोगों से भी पैसे ले चुका था.

प्रियंका के मुताबिक, अकसर उस के पिता राजू से अपना पैसा वापस मांगा करते थे, लेकिन वह हर बार देने से मना कर देता था. अब आरती और राजू कहां हैं, इस पर प्रियंका ने बताया कि वे दोनों इसी साल जनवरी में काम छोड़ कर चले गए और इंदौर में उन्होंने ब्यूटीपार्लर खोल लिया है, जिस का किराया साढ़े 8 हजार रुपए महीना है.

यह जानकारी महत्त्वपूर्ण थी. लेकिन हत्या राजू ने ही की थी तो वह है कहां? इस सवाल का जवाब हासिल करने के लिए पुलिस ने राजू का फोन नंबर ले कर उसे फोन लगाया तो उस ने खुद के ग्वालियर में होने की बात कही.

हत्यारा राजू ही है, इस पर पुलिस का शक गहराने लगा था क्योंकि अब तक यह स्पष्ट हो चुका था कि नायर दंपति के अपने रिश्तेदारों से संबंध अच्छे थे और पटाखा विवाद बेहद मामूली था. एक राजू ही था जो घर के सदस्य की तरह नायर दंपति के यहां बेरोकटोक आजा सकता था. लेकिन ग्वालियर में होते हुए वह दोहरे कत्ल की वारदात को कैसे अंजाम दे सकता था, यह बात किसी सस्पेंस से कम नहीं थी.

हालांकि यह मुमकिन था कि कोई भी शख्स भोपाल में हत्या कर के ग्वालियर जा सकता है, क्योंकि वहां का रास्ता महज 5 घंटे का था. अब तक की काररवाई में यह तो उजागर हो गया था कि हत्याएं रात साढ़े 9 से 12 बजे के बीच हुई थीं. यानी राजू के हत्या कर के ग्वालियर भाग जाने की बात संभव थी. भोपाल से ग्वालियर के लिए रात में ट्रेनों की भी कमी नहीं थी.

भोपाल सहित पूरे देश में रिटायर्ड एयरफोर्स अधिकारी की हत्या पर चर्चाएं होने लगी थीं. हर कोई पुलिस को कोस रहा था कि वह शहर में रह रहे अकेले बुजुर्गों की हिफाजत के लिए कोई इंतजाम नहीं करती. और तो और, पुलिस के पास अकेले रह रहे बूढ़ों का कोई डाटा या रिकौर्ड तक नहीं है. इन सब आलोचनाओं से परे पुलिस के हाथ हत्यारे के गिरेहबान तक पहुंच चुके थे. देर बस गिरफ्तारी की थी, जो 10 मार्च को हो भी गई और राजू ने अपना जुर्म भी कबूल कर लिया.

दरअसल, पुलिस राजू और आरती के मोबाइल काल्स पर ध्यान रखे हुए थी. दोनों में बातचीत हो रही थी और नायर दंपति की हत्या की खबर सुन कर आरती इंदौर से भोपाल आ गई थी. पुलिस ने आरती को रडार पर लिया तो उस ने बताया कि राजू जरूर उस से मिलने आएगा. भोपाल आ कर आरती गोपालनगर झुग्गी इलाके में रुकी थी.

राजू को कतई अंदाजा या अहसास नहीं था कि भोपाल में पुलिस उस का स्वागत करने को तैयार है. वह तो अपने मालिक की हत्या पर शोक प्रकट करने इसलिए आ रहा था ताकि पुलिस उस पर शक न करे. जैसे ही वह भोपाल आया, सादे कपड़ों में तैनात पुलिसकर्मियों ने उसे स्टेशन से धर दबोचा.

पहले तो वह हत्या की वारदात से नानुकुर करता रहा, लेकिन जल्द ही टूट भी गया. उस ने हत्या का सच उगल दिया.

राजू ने मांबाप सरीखे दंपति को पैसे के लिए लगाया ठिकाने 32 वर्षीय राजू धाकड़ मूलत: ग्वालियर के हीरापुर गांव का रहने वाला था. उस ने वाकई जी.के. नायर से लगभग 2 लाख रुपए उधार ले रखे थे और उस की नीयत पैसे देने की नहीं थी. इस बात पर नायर उसे कभीकभी डांटा भी करते थे, जो उसे नागवार गुजरता था. इतना ही नहीं, राजू को यह शक भी था कि भेल के ठेका श्रमिक की नौकरी से उसे नायर ने ही निकलवाया है.

घटना की रात हत्या के इरादे से राजू कोई 9 बजे ग्वालियर से भोपाल आया. इस बाबत उस ने चाकू भी ग्वालियर से खरीद लिया था. भोपाल आ कर वह एसओएस बालग्राम स्टाप पर उतरा और वहां से पैदल ही नायर के घर तक गया. उस समय नायर दंपति टीवी देख रहे थे.

राजू को देखते ही नायर की भौंहे तन गईं. उन्होंने उसे दरवाजे से ही वापस कर दिया. इस पर राजू ने गिड़गिड़ाते हुए उन्हें पुराने संबंधों का वास्ता दिया तो नरम दिल नायर पिघल उठे और उन्होंने उसे अंदर आने दिया.

उन की यह इजाजत भारी भूल साबित हुई. आदतन नायर ने फिर पैसों का तकादा किया तो राजू हमेशा की तरह बेशर्मी से नानुकुर करने लगा. बात करतेकरते दोनों पहली मंजिल पर आ गए, जहां नायर इत्मीनान से बैठ गए और राजू की खिंचाई करने लगे.

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इस बार राजू तय कर आया था, इसलिए जानबूझ कर विवाद को हवा दे रहा था. पुराने पैसे लौटाने की बात तो दूर राजू ने नायर से और पैसे मांगे तो वे झल्ला उठे और तेज आवाज में उसे डांटने लगे.

डांट सुन कर राजू को भी गुस्सा आ गया. वह हाथ धोने के बहाने बाथरूम में चला गया और मुड़ कर नायर के पीछे आ कर खड़ा हो गया. जेब से चाकू निकाल कर राजू ने नायर की गरदन पर 1-2 नहीं बल्कि गिन कर पूरे 10 प्रहार किए और 11वीं वार में उन का गला रेत डाला.

ताबड़तोड़ हमलों से घबराए और तड़पते जी.के. नायर पत्नी का नाम ले कर चिल्लाए. उन की चीख सुन कर गोमती पहली मंजिल की तरफ दौड़ीं. पैरों में तकलीफ होने के कारण गोमती कभी पहली मंजिल पर नहीं जाती थीं.

मालिक का काम तमाम कर के राजू अभी उठा ही था कि मालकिन सामने आ गईं. गोमती को भी उस ने नहीं बख्शा और उसी चाकू से उन का गला रेत दिया.

चीखें भी रहीं बेअसर

यही वे चीखें थीं, जो रत्ना मिस्त्री ने सुनी थीं. लेकिन रोजमर्रा की आम बातचीत समझ कर उन्होंने उन्हें इसे नजरअंदाज कर दिया था. जी.के. नायर ने बचाव की कोशिश की थी, जिस में हाथापाई के दौरान चाकू उलट कर राजू की जांघ में भी लग गया था. लेकिन उसे ज्यादा चोट नहीं आई थी.

2 हत्याएं कर के राजू ने किचन में जा कर खून से सना चाकू साफ किया और पूरा किचन साफ कर दिया. खून के धब्बे लगी अपनी पैंट उतार कर उस ने घर से उठा कर नीले रंग का लोअर पहना और जाने से पहले सोने के जेवरों पर हाथ साफ कर दिया.

उस ने अलमारी में सोने की 8 चूडि़यां चुराईं और फिर मृत गोमती के गले में पड़ी चेन भी उतार ली. बाथरूम जा कर उस ने खून से सने कपड़े भी धोए और फिर एक नजर घर पर डाल कर बालकनी के रास्ते कूद कर चला गया. स्टेशन तक वह पैदल ही गया और ग्वालियर जाने वाली ट्रेन में बैठ गया. सुबह ही वह वापस भोपाल के लिए रवाना हो गया, जिस का अंदेशा आरती पुलिस वालों के सामने जता चुकी थी.

राजू के मन में लालच और हैवानियत दोनों आ गए थे. नायर दंपति की मेहरबानियों का बदला उस ने बजाय नमक हलाली के नमक हरामी से चुकाया. लगता यही है कि नौकरों पर जरूरत से ज्यादा मेहरबानियां और दयानतदारी जानलेवा भी हो सकती है. इन दोनों के कत्ल की उस की हिम्मत इसलिए भी पड़ी कि दोनों अकेले रहते थे और राजू के बारे में सब कुछ जानता था.

आरती के मन में अपने मालिकों के उपकारों के प्रति कृतज्ञता थी, जिस के चलते उस ने अपने हत्यारे पति को बचाने की कोशिश नहीं की. हालांकि इस दोहरे हत्याकांड में इस बात का कलंक भी लगा कि जी.के. नायर की हत्या की एक वजह उन के आरती से कथित अवैध संबंध भी थे.

भोपाल के डीआईजी धर्मेंद्र चतुर्वेदी के मुताबिक, राजू ने अपने बचाव में हत्या की वजह रुपयों के लेनदेन के अलावा व्यक्तिगत वजह भी बताई है. लेकिन स्पष्ट रूप से इन निजी कारणों का खुलासा पुलिस ने जाने क्यों नहीं किया.

अपने बचाव की कोशिश में राजू ने 24 घंटों में ग्वालियर भोपाल अपडाउन किया, लेकिन वह खुद का गुनाह छिपा नहीं पाया.

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