सरस सलिल विशेष

इन बच्चों की उम्र 14 साल से कम  है, लेकिन रोजाना इन्हें अकसर 14 घंटे से ज्यादा हाड़तोड़ मशक्कत करनी पड़ती है. कहने को तो ये बाल मजदूर हैं, लेकिन अपनी उम्र और कूवत से बढ़चढ़ कर बालिगों से कहीं ज्यादा मेहनत करते हैं. सुबहसवेरे जब आमतौर पर लोग सो कर उठते हैं, तब तक ये बच्चे रूखीसूखी रोटी का पुलिंदा बगल में दबाए अपनी काम की जगह पर मौजूद हो चुके होते हैं, फिर 15-16 घंटे की मेहनत के बाद थकान से चूर रात को घर लौट कर बिस्तर पर लेटते हैं, तो दूसरे दिन ही नींद खुलती है. यही जिंदगी है इन नन्हे कामगारों की. इतनी मेहनत के बावजूद ये मजदूर महीने के आखिर में पाते हैं महज कुछ सौ रुपए, पर इस से ज्यादा इन्हें मालिकों से मिलता है जोरजुल्म. अपनी बुनियादी जरूरतों से दूर ये बच्चे नाजुक उम्र में ही भयानक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, बीड़ी उद्योग के बाल मजदूर नाक की बीमारी, उनींदापन, निकोटिन के जहर से पैदा होने वाली बीमारी, सिरदर्द, अंधेपन वगैरह के शिकार हो जाते हैं, वहीं कालीन उद्योग के बच्चे लगातार धूल और रेशों में रह कर फेफड़ों की बीमारी से घिर जाते हैं.

पटाका और माचिस उद्योग के बाल मजदूर सांस की परेशानी, दम घुटना, थकावट, मांसपेशियां बेकार हो जाने जैसी गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं. इसी तरह ताला उद्योग में तेजाब से जलना, दमा, सांस का रुक जाना, टीबी, भयंकर सिरदर्द होना आम बात है. खदानों में काम करने वाले बच्चों की आंखों, फेफड़ों व चमड़ी की बीमारियों का तोहफा मिलता है, तो कांच उद्योग में काम कर रहे बाल मजदूर आग उगलती भट्ठियों के नजदीक हर समय कईकई घंटे तीनों ओर से गरम कांच से घिरे रह कर कैंसर, टीबी और मानसिक विकलांगता जैसी बीमारियां पाल लेते हैं. इसी तरह मध्य प्रदेश के मंदसौर इलाके के स्लेट उद्योग में काम करने वाले बच्चे वहां स्लेट, पैंसिल बनाने के लिए खान से स्लेटी रंग की लगातार उड़ती धूल में रह कर फेफड़ों और सांस की तरहतरह की गंभीर बीमारियों से घिर जाते हैं. गुब्बारा उद्योग में काम करने वाले बच्चों की हालत तो और भी ज्यादा खतरनाक है. वे नन्ही उम्र में ही दिल की बीमारी, निमोनिया और सांस की बीमारी की जकड़ में आ जाते हैं.

इतना ही नहीं, ढाबों में काम कर रहे या घरेलू बाल मजदूर नशीली चीजों के सेवन के आदी तो हो ही जाते हैं, शारीरिक और यौन शोषण, ज्यादा काम और दूसरी तरह से भी वे खूब सताए जाते हैं. गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक, खेतखलिहानों, अलगअलग लघु व कुटीर उद्योगों, पत्थर खदानों, ढाबों और घरेलू कामों में तकरीबन 10 करोड़ बच्चे मजदूर बने हुए हैं. यह आलम तो तब है, जब कई लैवलों पर कई सालों से बाल मजदूर उन्मूलन के लिए कायदेकानूनों की झड़ी लगा दी गई है. आज भी नए कानून बनाने व बाल मजदूरी लगाने की कोशिश जारी है. फिर आखिर क्या वजह है कि बाल मजदूरी में कमी आने के बजाय लगातार इजाफा ही हो रहा है?

मिसाल के तौर पर, ‘बाल दिवस’ यानी बच्चों के प्रिय चाचा नेहरू के जन्मदिन के मौके पर जगहजगह सैमिनार, भाषणबाजी और न जाने क्याक्या होता है, पर इन सब से अनजान चाचा नेहरू के 10 करोड़ लाड़ले उस समय रोटी की जुगाड़ में न जाने क्याक्या, सह रह होते हैं. कुछ लोग बच्चों को मजदूर बनाने में उन से काम कराने वालों का भी बहुत बड़ा हाथ मानते हैं. ऐसे लोगों का लालच यही होता है कि बाल मजदूरी सस्ती पड़ती है. छोटेछोटे कुटीर उद्योग जहां जगह की कमी होती है, इसीलिए बच्चों को काम पर रखा जाता है, क्योंकि वे जगह कम घेरते हैं, जिस से ज्यादा से ज्यादा बच्चे वहां ज्यादा से ज्यादा काम कर सकते हैं. ये बच्चे पूरी तरह से असंगठित होते हैं, जिस से अपने शोषण के खिलाफ मालिक के सामने आवाज नहीं उठा सकते. दूसरी ओर, मालिकों को इन्हें रखने की मजबूरी यह होती है कि कुछ काम ऐसे होते हैं, जिन्हें केवल बच्चे ही पूरी सफाई से कर सकते हैं.

मसलन, कालीन उद्योग में कालीन बनाते समय जगहजगह गांठ लगाने की जरूरत पड़ती है. सफाई से गांठ लगाने के लिए उंगलियों का पतला होना जरूरी है, इसीलिए इस उद्योग में बच्चों को अहमियत दी जाती है. इसी तरह माचिस उद्योग में बाल मजदूर लगे होने से माचिसों की बनाने की लागत कम आती है. कम लागत के चलते विदेशी माचिसों से होड़ लेने में दिक्कत नहीं आ रही है. फिर भी बाल मजदूरी कराने वाले मालिकों और बाल मजदूरी के पक्ष में चाहे जो भी दलीलें पेश की जाएं, सचाई तो यही है कि बाल मजदूरी से कई और तरह की सामाजिक दिक्कतें बढ़ी हैं. यह सच है कि गरीबी के चलते बच्चे मजदूरी के लिए मजबूर हैं, पर इस से पैदा होने वाली समस्याएं कहीं ज्यादा गंभीर हैं. चूंकि कुछ इलाको में केवल बच्चों को ही काम पर रखा जाता है, इसलिए उन के मांबाप अकसर बेरोजगार ही होेते हैं.

दूसरी ओर, 15 साल से बड़ा होते ही इन बच्चों को काम से हटा दिया जाता है, इसलिए मांबाप यह मान कर चलते हैं कि ज्यादा बच्चे होने से आमदनी बराबर बनी रहेगी, क्योंकि बड़े बच्चे के काम से हटते ही छोटा संभाल लेगा, फिर उस के बाद उस से छोटा और फिर उस से छोटा. इस सिलसिले को जारी रखने के लिए बच्चों की तादाद ज्यादा रखना मजबूरी बन जाती है. यह सोच आबादी की समस्या को गंभीर बना रही है. पर इन सब में सब से ज्यादा चिंताजनक पहलू तो सेहत ही है, क्योंकि पैसे की कमी में ये बाल मजदूर न तो ठीक से इलाज करा पाते हैं और न ही ठीक से खानेपीने का बैलैंस बनाए रख पाते हैं, इसलिए ये बच्चे जवानी आतेआते गंभीर बीमारियों के शिकार हो कर कदमकदम पर कतराकतरा मौत का इंतजार करते हैं. यकीनन, आज के बच्चे ही कल का भविष्य हैं, लेकिन जहां के एकतिहाई बच्चे बचपन की बुनियादी सुविधाओं से अलग हो कर मेहनतमजदूरी में रातदिन एक कर रहे हैं व कम उम्र में ही भयानक बीमारियों से घिर जाते हैं, भविष्य में उन की जगह कहां होगी? क्या बीमार बच्चों के नाजुक कंधों पर तैयार की जा रही भविष्य के विकास की बुनियाद मजबूत हो पाएगी? कब इन्हें इन का हक मिल पाएगा? इन सवालों के जवाब भारत के नीति बनाने वालों के पास भी नहीं है.

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