सरस सलिल विशेष

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 18 अगस्त को सृजन घोटाले की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश कर दी. इस घोटाले में कई सरकारी बैंक भी लिप्त हैं. मामले में अब तक 10 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं. 9 एफआईआर भागलपुर में और 1 सहरसा में दर्ज की गई हैं. 12 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है और अब तक 1,200 करोड़ रुपए से ज्यादा के घोटाले का पता चला है. जांच में लगे अफसरों को घोटाले की रकम के और बढ़ने की आशंका हैं.

18 अगस्त को बैंक औफ बड़ौदा के सहायक मैनेजर अतुल रमण को गिरफ्तार किया गया. साल 2013 में अतुल की बहाली हुईर् थी. एसआईटी की टीम ने भागलपुर के परबत्ती इलाके में स्थित उस के घर से उसे उठाया.

अतुल ने एसआईटी को बताया कि वह सृजन महिला विकास समिति भागलपुर की संचालिका मनोरमा देवी के इशारों पर काम कर रहा था. उस की नौकरी नई थी, इस वजह से उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था और वह मनोरमा देवी के निर्देशों का पालन भर कर रहा था.

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अतुल पर आरोप है कि वह सरकारी रकम को सृजन के खाते में ट्रांसफर करवाने में मुख्य भूमिका अदा करता था. उस के बदले उसे मनोरमा देवी से मोटा कमीशन मिलता था.

अप्रैल महीने में उस ने तिलकामांझी खानपट्टी में रहने वाली बीबी हुजमान निगार नाम की महिला से इशाकचक थाना के बरहपुरा महल्ले में 51 लाख रुपए में एक मकान खरीदा था. अतुल की पत्नी जूली के नाम पर बैंक औफ बड़ौदा के खाते में 5 लाख 12 हजार रुपए जमा हैं. इस के अलावा तिलकामांझी के बैंक औफ इंडिया में 1 लाख रुपए समेत ततारपुर और स्टेट बैंक के सिटी ब्रांच और यूको बैंक में उस के और उस की पत्नी के नाम पर काफी रुपए जमा हैं. अतुल और उस की पत्नी के पास 10 लाख 5 हजार रुपए के गहने हैं.

अतुल ने एसआईटी के सामने कुबूल किया कि बैंक औफ बड़ौदा के सीनियर मैनेजर वरुण कुमार सिन्हा और रिटायर सहायक संत कुमार सिन्हा बैंक के सरकारी खातों को देखते थे और वही दोनों सृजन के खाते में रुपए ट्रांसफर करते थे.

अतुल का दावा है कि सरकारी खातों में कई गड़बडि़यां देख कर उस ने वरुण कुमार सिन्हा से इस की शिकायत की थी तो कहा गया कि खातों को देखने का काम उस का नहीं है. जैसा कहा जाता है, वैसा करते रहो. अतुल ने घोटाले में बैंक के पूर्व मैनेजर जी पी पांडा, सरफराउद्दीन, अरुण कुमार सिंह, इंडियन बैंक के अजय कुमार पांडे, मनोरमा देवी का ड्राइवर अंसार और वंशीधर समेत कई नामों का खुलासा किया है.

सृजन की सचिव प्रिया कुमार और उस के पति अमित कुमार की गिरफ्तारी के लिए पुलिस पटना, दिल्ली, रांची और बेंगलुरु में छापामारी कर रही है. मनोरमा देवी की बहू प्रिया कुमार रांची के एक बड़े कांग्रेसी नेता की बेटी है. उस नेता का एक रिश्तेदार केंद्र सरकार में मंत्री भी है. केंद्र में उन के मंत्री रहते हुए सृजन को केंद्र सरकार की कई योजनाएं मिली थीं. पुलिस इस की भी छानबीन कर रही है. मनोरमा के बेटे अमित कुमार के बारे में पुलिस को जानकारी मिली है कि दिल्ली में अमित कोई कार्यक्रम करता तो केंद्रीय मंत्री उस में शामिल होते थे.

सृजन घोटाले की किंगपिन मनोरमा देवी के बेटे अमित कुमार और उस की पत्नी प्रिया पुलिस को लगातार चकमा देने में कामयाब रहे हैं. दोनों अपने करीबियों से फोन के बजाय व्हाट्सऐप से बातें कर रहे हैं, जिस से पुलिस को उन का लिंक नहीं मिल रहा है. बिहार पुलिस के अनुरोध पर अमित और प्रिया के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया गया है.

हैरत की बात यह है कि पद्म सम्मान के लिए भी मनोरमा देवी दावा कर चुकी थी. 1,200 करोड़ रुपए के महाघोटाले की मास्टरमाइंड और सृजन की संस्थापिका मनोरमा ने वर्ष 2016 के पद्म सम्मान के लिए गृह मंत्रालय को आवेदन भेजा था. 13 फरवरी, 2017  को मनोरमा की मौत हो गई. सृजन एनजीओ को बनाना और उस से 6 हजार महिलाओं को जोड़ कर उन्हें स्वरोजगार मुहैया कराने का आधार बना कर आवेदन किया गया था.

घोटाले का खेल

सृजन महिला विकास सहयोग समिति नाम के एनजीओ के जरिए घोटाले का खेल साल 2006-07 में ही शुरू हो चुका था. घोटाले से परदा हटने में करीब 10 वर्ष लग गए और घोटालेबाज चांदी काटते रहे. भागलपुर जिला प्रशासन को विभिन्न योजनाओं की रकम सरकार द्वारा भेजी जाती थी. भागलपुर जिला प्रशासन के बैंक खातों में पहुंची रकम को प्रशासन द्वारा विभिन्न योजनाओं के लिए खोले गए सरकारी बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिया जाता था. घोटाले की नींव वहीं से पड़ी.

अफसरों के फर्जी हस्ताक्षर से इन बैंकों के खातों से रुपए सृजन के खातों में ट्रांसफर कर दिए जाते थे. एनजीओ द्वारा रुपयों को बाजार में ब्याज पर लगाया जाता था. जब किसी योजना के लिए राशि की निकासी का चैक जारी होता तो उतना रुपया एनजीओ द्वारा संबंधित खाते में डाल दिया जाता था. यह खेल पिछले 10-11 सालों से चल रहा था.

एनजीओ की संचालिका मनोरमा देवी की फरवरी 2017 में मौत हो गई. उस के बाद सरकार द्वारा लाभार्थियों को देने वाले चैक बाउंस होने लगे. जांच में पता चला कि सरकारी खातों में तो रुपए हैं ही नहीं, जबकि बैंक स्टेटमैंट में रुपया होने की बात कही जाती थी. मनोरमा देवी की मौत के बाद खेल बिगड़ गया और सारे मामले का खुलासा होने लगा. जांच में पाया गया है कि भागलपुर सैंट्रल कोऔपरेटिव बैंक का इंडियन बैंक के खाते में रखे 30 करोड़ 17 लाख 52 हजार रुपए और बैंक औफ बड़ौदा में रखे 17 करोड़ 94 लाख 85 हजार रुपए गायब हैं. दोनों बैंकों के स्टेटमैंट में तो रुपया दिखा रखा है, लेकिन खाते से रुपया गायब है.

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एडीजी (हैडक्वार्टर) संजीव कुमार सिंघल ने बताया, ‘‘मनोरमा देवी की मौत के बाद सृजन से जुड़े अकाउंट डिसऔर्डर होने लगे, तो हंगामा खड़ा हो गया. जब मामले की जांच की गई तो पिछले 10 वर्षों से हो रहे घोटाले का भंडाफोड़ होने लगा.’’

बैंक और प्रशासनिक अफसरों की मिलीभगत से हुए इस घोटाले में दर्जनों अफसरों और सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड के तमाम पदधारकों के खिलाफ जालसाजी, धोखाधड़ी और फर्जी निकासी के मामले भागलपुर के तिलकामांझी थाने में दर्ज कराए गए.

एफआईआर में भागलपुर के 3 पूर्व जिलाधीशों नर्मदेश्वर लाल, संतोष कुमार मल्ल और विपिन कुमार के जाली हस्ताक्षर से बैंक प्रबंधकों द्वारा सृजन के खाते में रकम ट्रांसफर करने का आरोप लगाया गया है. नर्मदेश्वर लाल के फर्जी दस्तखत से 20 करोड़ रुपए और संतोष मल्ल व विपिन कुमार के जाली दस्तखतों से 5-5 करोड़ रुपए की निकासी की गई थीं.

आर्थिक अपराध इकाई के आईजी जितेंद्र सिंह गंगवार कहते हैं, ‘‘जिला भू अर्जन विभाग और जिला नजारत के खातों से सरकारी रकम का गोलमाल हुआ है. इन विभागों के लेखा अधिकार और मुलाजिम घोटाले में शामिल हैं. इस के साथ ही इंडियन बैंक और बैंक औफ बड़ौदा के मुलाजिम भी इस में शामिल हैं. सृजन घोटाला के जरिए जहां दोनों बैंकों को मोटा बिजनैस मिल रहा था वहीं बैंक के अफसरों और मुलाजिमों की जेबें भी गरम हो रही थीं.’’

अफसरों की मिलीभगत

सवाल उठता है कि इतने बड़े घोटाले का खेल पिछले एक दशक से चल रहा था और किसी को भनक तक नहीं लगी? सरकारी खाते में रकम जाते ही उसे तुरंत कैसे सृजन के खाते में ट्रांसफर कर दिया जाता था? सालाना औडिट में भी इस घोटाले का पता क्यों नहीं लग पाता था?

मुख्यमंत्री नगर विकास योजना की 12 करोड़ 20 लाख रुपए की राशि जब इंडियन बैंक के सरकारी खाता नंबर-6268727981 में जमा होनी थी तो किस ने और कैसे उस राशि को सृजन महिला विकास सहयोग समिति के खाते में जमा करवा दिया? प्रशासन और बैंक अफसरों की सांठगांठ के बगैर ऐसा मुमकिन ही नहीं है. वहीं दूसरी ओर, सृजन की ओर से करीब ढाई वर्षों बाद उसी सरकारी खाते में 20 करोड़ रुपए जमा कर दिए गए. आखिर सरकारी खाते में आरटीजीएस के जरिए इतनी बड़ी रकम क्यों जमा की गई?

सृजन के जरिए करोड़ों रुपयों के घोटाले का पैसा रियल स्टेट कारोबार में लगाया गया है. सरकारी खातों से सृजन के खाते में जमा की गई रकम में से करोड़ों रुपए दूसरे राज्यों में भी ट्रांसफर किए गए हैं. आरटीजीएस और चैक के जरिए दिल्ली, गाजियाबाद, गुड़गांव, ओडिशा और झारखंड के रियल स्टेट कंपनियों को रुपए दिए गए हैं.

घोटाले से भरी तिजोरियां

सृजन घोटाले की रकम की सूंड़ धीरेधीरे बढ़ती ही जा रही है. यह 1,200 करोड़ रुपए के आसपास पहुंच चुकी हैं और इस के अभी भी बढ़ने की आशंका है. घोटाले में शामिल भागलपुर जिला कल्याण पदाधिकारी अरुण कुमार का मासिक वेतन 60 हजार रुपए हैं जबकि वह करोड़ों की संपत्ति का मालिक बन बैठा है.

पटना के श्रीकृष्णपुरी महल्ले के भगवान कुंज अपार्टमैंट के फ्लैट नंबर 205 में ईओयू ने छापा मारा तो 45 लाख रुपए नकद, करोड़ों रुपए के गहने, अलगअलग बैंकों की 19 पासबुकें बरामद की गईं. पटना के शास्त्रीय महल्ले के आदर्श नगर में अरुण के नाम से जमीन है और बारीपथ में 1 करोड़

15 लाख रुपए की 2 दुकानें हैं. फ्रेजर रोड के डुंडा शाही कमर्शियल कौंपलैक्स में 2 दुकानें उस के नाम से हैं, जिन की कीमत 2 करोड़ रुपए के करीब है. अरुण की पत्नी इंदू देवी करोड़ों रुपए की दौलत की मालकिन है.

भागलपुर के पूर्व एसडीओ कुमार अनुज की पत्नी दिव्या सिन्हा सृजन से जुड़ी हुई थी. उन्होंने अनुज को 8 लाख रुपए की हार्ले डैविंसन मोटरसाइकिल गिफ्ट में दी थी. अनुज के घर का खर्च भी सृजन के पैसे से चल रहा था क्योंकि पिछले 10 महीने में उस ने अपने वेतन की निकासी ही नहीं की थी.

एनजीओ सृजन की स्थापना 1996 में हुई थी. दावा किया गया था कि संस्था गांव की औरतों के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और नैतिक विकास का काम करती है. इस का कार्य क्षेत्र भागलपुर जिला के सबौर, गौरडीह, कहलगांव, जगदीशपुर, सन्हौला समेत 16 प्रखंडों तक फैला हुआ है.

इस का मकसद औरतों को एकजुट करना, उन्हें स्वरोजगार के लिए ट्रेनिंग देना, बचत करने का गुर सिखाना, उत्पादन और मार्केटिंग की जानकारी देना, साक्षरता को बढ़ाना और प्राथमिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करना है. अपने मकसद से भटक कर संस्था प्रशासनिक अफसरों और बैंकों के अफसरों के साथ मिल कर सरकारी फंड का बंदरबांट करने में लग गई थी.

किसानों को मुआवजा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के रुपए जिले में जाते थे, उन्हें फर्जी तरीके से सृजन के खाते में ट्रांसफर कर दिया जाता था. जांच में खुलासा हुआ है कि जिलाधीश और दूसरे अफसरों के हस्ताक्षर वाले चैक को पहले सरकारी खातों में जमा कराया जाता था, उस के बाद उस रकम को सृजन के खाते में ट्रांसफर कर दिया जाता था.

सृजन उन रुपयों को खुलेबाजार में कर्र्ज पर लगाती, व्यापारियों को उधार देती, रियल स्टेट के कारोबार में लगाती, अफसरों को कर्ज बांटती थी. सरकारी खातों में जब जितने रुपयों की जरूरत होती तो सृजन उतने रुपए सरकारी खातों में डाल देती थी. इस मामले में बैंक अफसर सृजन को जानकारी देते थे कि किसी योजना के लिए रुपए निकासी का चैक आया है और सृजन के संचालक उतने रुपए सरकारी खाते में डाल देते थे. इस वजह से सृजन की कारस्तानी पकड़ में नहीं आती थी. सृजन की मुख्य संचालिका मनोरमा देवी की मौत के बाद सारे गोरखधंधे से परदा हटने लगा.

नेताओं और सरकारी अफसरों के साथ मिल कर ही सृजन ने घोटाले के पौधे को सींचसींच कर बड़ा पेड़ बना दिया था. समाज कल्याण विभाग की मानें तो वर्ष 2002-03 में जब अमिताभ वर्मा सहकारिता विभाग के सचिव थे तो उन्होंने भी सृजन को काफी मदद पहुंचाई थी. 1988 से ले कर 2003 तक सरकार ने तमाम कोऔपरेटिव बैंकों के अधिकार छीन लिए थे और उन के सभी पदों के लिए होने वाले चुनाव पर रोक लगा रखी थी. उस के बाद भी सृजन की संचालिका मनोरमा देवी को बिहार स्टेट कोऔपरेटिव बैंक का डायरैक्टर बना दिया गया था.

डायरैक्टर बनने के बाद जब डैलिगेट्स के चुनाव हुए तो उस में मनोरमा हार गई थी. कुल 17 वोट का इस्तेमाल हुआ था और मनोरमा 2 वोट से चुनाव हार गई थी. उस समय भागलपुर के सैंट्रल कोऔपरेटिव बैंक के एमडी रहे कवींद्र नाथ ठाकुर ने हद से बाहर जा कर मनोरमा की मदद की. उन्होंने जीते हुए डैलीगेट्स के नाम सहकारिता विभाग के हैडक्वार्टर को भेजे ही नहीं और मनोरमा पूरे 5 वर्षों तक डायरैक्टर बनी रह गई और बेधड़क हो कर घोटाले का खेल खेलती रही.

कोऔपरेटिव बैंक की डायरैक्टर बनने के बाद मनोरमा का संपर्क बड़े नेताओं और अफसरों के बीच बढ़ने लगा. बैंक के नियमों और भारतीय रिजर्व बैंक की गाइडलाइन की अनदेखी कर मनोरमा ने अपने ही एनजीओ सृजन को बड़ेबड़े लोन दे दिए थे. सृजन के जरिए सरकारी रकम कई नेताओं को भी कर्ज के रूप में दी गई थी.

वर्ष 2007 से ले कर 2014 तक भागलपुर सैंट्रल कोऔपरेटिव बैंक के एमडी रहे पंकज झा ने भी खुलेदिल और हाथों से मनोरमा की अवैध तरीके से मदद की. बैंक के अकाउंट्स मैनेजर हरिशंकर उपाध्याय के साथ मिल कर पंकज ने सरकारी खाते को स्टेट बैंक से हटा कर इंडियन बैंक में खुलवा लिया. उस के बाद कोऔपरेटिव बैंक में रखे किसानों के रुपए सृजन के खाते में ट्रांसफर होने लगे. उस के बाद घोटाले ने काफी तेज रफ्तार पकड़ ली थी. हरिशंकर की पहुंच व पैरवी इतनी दमदार थी कि उस की बहाली भागलपुर सैंट्रल कोऔपरेटिव बैंक में हुई और वहीं से वह रिटायर भी हुआ. कभी भी उस का तबादला नहीं हुआ.

सृजन महाघोटाला को छिपाने और दबाने के लिए घोटालेबाजों ने एक के बाद एक कई घोटाले कर डाले. घोटाले का परतदरपरत खुलना साबित करता है कि अभी इस की कई परतें खुलनी बाकी हैं. 1996 में हुए 960 करोड़ रुपए के चारा घोटाले को इस ने काफी पीछे छोड़ दिया है. सरकारी खजाने का जम कर दुरुपयोग हुआ और उस से करोड़ों रुपए बनाए गए. सरकारी अफसरों के साथ सृजन के लोगों की ऐसी सांठगांठ थी कि नियमों के खिलाफ जा कर प्रखंडों के सरकारी खाते सृजन में खोले गए. वर्ष 2006 में उस समय भागलपुर के जिलाधीश विपिन कुमार ने सृजन में खोले गए सभी सरकारी खातों को बंद करने का आदेश दिया था. जिलाधीश के आदेश के बाद 2-4 खातों को तो बंद कर दिया गया पर बाकी खाते चलते रहे.

सृजन के जरिए घोटाले का खेल साल 2000 से ही शुरू हो गया था. उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि लालूराबड़ी के राज से ही सृजन का खेल शुरू हो गया था. संस्था को दफ्तर के लिए साल 2000 में ही ट्राइसेम भवन 30 साल के लिए लीज पर दे दिया गया था. राबड़ी के शासनकाल में ही उसे साबौर में 24 डिसमिल जमीन दी गई. सरकारी रकम को सृजन के खाते में जमा करने का आदेश 2003 में ही जारी किया गया था.

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सृजन घोटाले में गिरफ्तार नाजिर महेश मंडल की हिरासत में मौत हो जाने के बाद और भी हंगामा खड़ा हो गया है. पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव कहते हैं कि सृजन घोटाला मध्य प्रदेश के व्यापमं घोटाले से भी बड़ा है. घोटाले के आरोपियों को मारा जा रहा है, ताकि सचाईर् सामने नहीं आ सके. मंडल की मौत पर पुलिस सफाई दे रही है कि उस की मौत बीमारी की वजह से हुई है.

बिहार के डीजीपी पी के ठाकुर कहते हैं कि 14 अगस्त को गिरफ्तार किया गया महेश मधुमेह और किडनी का मरीज था. उसे न्यायिक हिरासत में भेजते समय बीमारी के सारे कागजात साथ भेजे गए थे. जेल अस्पताल के अलावा मायागंज के अस्पताल में भी उस का इलाज कराया गया. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मापदंड के मुताबिक कैदी का पूरा ध्यान रखा गया था.

भागलपुर के पूर्व जिलाधीश के पी रमैया ने 20 दिसंबर, 2003 को चिट्ठी लिख कर सभी बीडीओ को आदेश दिया था कि सृजन के खाते में सरकारी योजनाओं की रकम जमा की जाए. रमैया की वह चिट्ठी जिला प्रशासन के रिकौर्ड से गायब है. 24 अगस्त को एसआईटी ने जब चिट्ठी की मूल कौपी की मांग की तो वह चिट्ठी नहीं मिली. चिट्ठी की एंट्री जिस रजिस्टर में की जाती है, वह भी गायब है. एसआईटी और ईओयू के पास चिट्ठी की फोटोकौपी है और वे मूल कौपी पाना चाहते हैं.

ऐसे उजागर हुआ महाघोटाला

भागलपुर भू अर्जन कार्यालय ने 74 करोड़ रुपए का बैंक औफ बड़ौदा का चैक बिहार सरकार के खाते में ट्रांसफर करने के लिए भेजा. रिकौर्ड के मुताबिक, भू अर्जन के खाते में 175 करोड़ रुपए जमा थे. चैक को ट्रेजरी से चालान के साथ स्टेट बैंक भेजा गया. स्टेट बैंक ने चैक के खाते को क्लीयरैंस के लिए बैंक औफ बड़ौदा को भेजा.

बैंक औफ बड़ौदा ने विभिन्न कारण बता कर 3 बार चैक को स्टेट बैंक को वापस कर दिया. स्टेट बैंक ने उस चैक को भू अर्जन विभाग को लौटा दिया. बैंक द्वारा अलगअलग वजहें बता कर एक ही चैक को 3 बार वापस लौटाने से प्रशासन के कान खड़े हो गए.

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प्रशासन ने बैंक औफ बड़ौदा को पत्र भेज कर रकम देने को कहा और एफआईआर दर्ज कराने की धमकी दी तो बताया गया कि खाते में पर्याप्त रकम नहीं है. इस की जानकारी 30 जुलाई को जिलाधीश को दी गई. मामले की जांच की गई तो महाघोटाला सामने आया.

कई सवालों का जवाब देना है सरकार को

सृजन घोटाले की भनक सीए संजीत कुमार को 2013 में लगी थी और उन्होंने आरबीआई से इस की शिकायत भी की थी. आरबीआई ने सहयोग समिति के रजिस्ट्रार को जांच का आदेश दिया था पर उस पर कोई कार्यवाही नहीं की गई. भागलपुर, बांका और सहरसा जिलों के प्रशासन ने सृजन घोटाले को दबाने की खूब कोशिश की. 2003 में तब के डी एम रमैया ने भी बीडीओ को सृजन के खाते में सरकारी रकम जमा कराने का निर्देश दिया था. 2008 में तब के डीएम ने उस आदेश पर रोक तो लगा दी पर मामले की जांच नहीं की. अगर जांच की गई होती तो मुमकिन है कि उसी समय घोटाले का भंडाफोड़ हो जाता. इस के साथ ही, कभी इस बात की पड़ताल किसी ने नहीं की कि सहरसा जिला के भू अर्जन विभाग का खाता भागलपुर के बैंक औफ बड़ौदा में क्यों रखा गया था?

वर्ष 2013 में जयश्री ठाकुर का 7 करोड़ 32 लाख रुपए का चैक सृजन में क्यों जमा कराया गया जबकि सृजन कोईर् बैंक नहीं था और न ही उसे आरबीआई से लाइसैंस मिला था? बांका जिला की भू अर्जन पदाधिकारी रही जयश्री ठाकुर के घर पर आर्थिक अपराध इकाई ने आय से अधिक संपति के मामले में छापा मारा था. उस समय भी प्रशासन ने मामले की जांच क्यों नहीं की?

खास बात यह है कि सृजन का हर साल औडिट होता था. औडिट रिपोर्ट में साफ था कि वहां बैंक चलाया जाता है, जबकि उसे केवल कोऔपरेटिव सोसाइटी चलाना था. औडिट रिपोर्ट सहकारिता विभाग और जिलाधीश को भेजी जाती थी पर कभी किसी ने जांच की जरूरत नहीं समझी.

उबलते लालू यादव

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव कहते हैं कि नीतीश कुमार और सुशील मोदी के संरक्षण में घोटाला हुआ है. यह पशुपालन से भी बड़ा घोटाला है. दोनों ने घोटाले को छिपाने के लिए ही सरकार बनाई है. घोटाले की शुरुआत साल 2005 में हुई और उसी साल नीतीश मुख्यमंत्री और सुशील मोदी उपमुख्यमंत्री बने थे.

लालू कहते हैं कि सृजन घोटाला करीब 2 हजार करोड़ रुपए का है और इस के मास्टरमाइंड सुशील कुमार मोदी हैं. वर्ष 2005 से ले कर 2013 तक वही वित्त मंत्री थे. उन के साथ ही भाजपा नेता और भागलपुर के पूर्व सांसद शाहनवाज हुसैन, गिरिराज सिंह और सुशील कुमार मोदी की बहन समेत 20 आईएएस अफसर भी फंसेंगे. 25 जुलाई, 2012 को केंद्र सरकार को इस घोटाले के बारे में चिट्ठी लिख कर जानकारी दी गई थी और जांच करने की अपील की गई थी, लेकिन कोईर् जांच नहीं कराई गई. लालू दावा करते हैं कि पूरा घोटाला नीतीश कुमार की जानकारी में था, पर वे चुप्पी साधे रहे.

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