सरस सलिल विशेष

लेखक, निर्माता, निर्देशक अनुराग कश्यप इन दिनों मीडिया, फिल्मर्सजकों और दर्शकों पर जमकर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं. उनकी राय में फिल्मकार का काम महज सवाल उठाना है. उनका दावा है कि वह सोशल मीडिया पर किसी को भी फौलो नहीं करते. वह सोशल मीडिया पर कुछ भी नहीं पढ़ते, सिर्फ अपनी बात कहने में यकीन रखते हैं. ‘बांबे वेल्वेट’ की असफलता के बाद अब वह नए कलाकारों वाली उत्तर प्रदेश की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘‘मुक्काबाज’’लेकर आ रहे हैं. 12 जनवरी 2018 को प्रदर्शित होने वाली फिल्म‘‘मुक्काबाज’’को अनुराग कश्यप स्पोर्ट्स और प्रेम कहानी वाली फिल्म मानते हैं. पर इसमें उन्होने जातिवाद सहित कई मुद्दे उठाए हैं.

फैंटम फिल्मस के बिखराव की काफी बातें हो रही है. सच क्या है?

ऐसा कुछ नहीं है. मीडिया में जो भी खबरे छप रही हैं, वह गलत है. किसी भी पत्रकार ने किसी खबर को छापने से पहले सत्यता की जांच नही की. आजकल पत्रकार सूत्र के नाम पर कोई भी खबर छाप देता है.

तो आप बता दें कि सच क्या है?

पिछले डेढ़ वर्ष से मैं और विक्रमादित्य मोटवानी हम दोनो नेटफिलिक्स की वेब सीरीज में व्यस्त हैं. इसी बीच हमने ‘मुक्काबाज’ और उसने ‘भावेश जोशी’ का भी निर्देशन किया. हम दोनों नेटफिलिक्स को मौलिक कंटेंट बनाकर देने के लिए मार्च 2018 तक काफी व्यस्त रहेंगे. फैंटम के अंदर काफी काम हो रहा है, पर बहुत शांति से हो रहा है.

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हम लोग शोर शराबा करके काम करने में यकीन ही नहीं रखते. बाजार में जो अटकलें चलती रहती हैं, हम उन्हे हवा नही देते. विकास अपनी फिल्म बना रहा है. मधु मेंटेना कुछ प्रोजेक्ट डेवलप कर रहे हैं. तो वहीं हमारी कुछ दूसरी फिल्मों पर लगातार काम चल रहा है. हम लोग काफी बड़े बड़े काम कर रहे है, पर सभी काम अभी वर्किंग स्तर पर है. फिलहाल हमारा सारा ध्यान नेटफिलिक्स पर है. यह भारत का पहला बहुत बड़ा व अति महंगा मौलिक सीरीज ‘शिखर गेम’ है. इस सीरीज में सैफ अली खान, नवाजुद्दीन सिद्दिकी, राधिका आप्टे वगैरह हैं. इसके आठ एपीसोड हैं. हर एपीसोड एक घंटे का होगा.

‘‘मनमर्जिया’’के दो निर्देशक बदल गए. कुछ कलाकार बदल गए. ऐसे में आप किस तरह इस फिल्म को आगे ले जाएंगे?

मैं इस तरह से नहीं सोचता हूं. इस फिल्म के निर्देशक क्यों फिल्म छोड़कर चले गए. कलाकार क्यों चले गए. इसकी अलग कहानी है. उस पर मेरा बात करना सही नहीं होगा. उस पर आनंद एल राय ही बात करें, तो सही होगा. जहां तक मेरे अपने काम करने का सवाल है, तो मैंने ‘मनमर्जिया’की कहानी व पटकथा पढ़ी. मुझे पसंद आयी. मैंने इस फिल्म को बनाने का निर्णय लिया. सच यह है कि इस फिल्म की कहानी में मुझे कुछ रोचक दिखा, इसलिए मैंने इससे जुड़ने का निर्णय लिया. मैं हमेशा वही फिल्म बनाता हूं, जिसकी कहानी में मुझे कुछ नजर आ जाता है. हो सकता है कि बहुतों को कुछ नजर ना आया हो. मैंने आनंद राय जी से कहा कि मुझे यह कहानी इस ढंग से नजर आ रही है और इसको इस ढंग से बनाने के लिए मुझे कलाकारों के चयन की पूरी छूट मिलनी चाहिए. उन्होंने इजाजत दे दी. मैंने कहा कि यदि काम करने की आजादी होगी, तो मैं काम करूंगा. किसी निर्देशक की जगह लेने का मतलब यह नही होता है कि आपने उसे धक्का दे दिया. एक फिल्म से निर्देशक या कलाकार के अलग होने या दूसरे के जुड़ने की कई वजहें होती हैं. सच कहूं तो ‘मनमर्जिया’ की कहानी इतनी आसान नही है. इसे बनाना भी आसान नही है. यह बहुत कठिन फिल्म है.

आनंद एल राय खुद भी एक माहिर निर्देशक हैं. ऐसे में उनकी तरफ से दखलंदाजी भी तो हो सकती है?

ऐसा सोचना ही नहीं चाहिए. वास्तव में एक अच्छा निर्देशक ही अच्छा निर्माता होता है. क्योंकि उसे पता होता है कि निर्देशक को कहां, किस तरह से काम करने की छूट देनी चाहिए. निर्देशक जब निर्माता बनता है, तो उसे पता होता है कि क्या नहीं करना चाहिए. आनंद एल राय काफी सुलझे हुए फिल्मकार व इंसान हैं. उन्हें दूसरों के साथ किस तरह काम किया जाना चाहिए, इसकी समझ है. लोगों को लगता है कि आनंद एल राय अपने निर्देशकों को तंग करते हैं, जबकि ऐसा कदापि नहीं है. वह तो अपने निर्देशकों को ताकत देते हैं. सारी बातचीत होने के बाद उन्होंने मुझसे आज तक नही पूछा कि आप किस किस कलाकार को ले रहे हो? इसी तरह ‘मुक्काबाज’ के दौरान भी उन्होंने मुझसे कोई सवाल नहीं किया. जब भी मैंने उनसे कहा कि एक दिन सेट पर आ जाएं, एक सीन देख लीजिए, उन्होंने मुझे एक ही बात कही कि, ‘मैं कहां आउंगा. मैं तो शाहरूख खान के साथ फिल्म को लेकर व्यस्त हूं. ’पर कुछ लोगों को समझ नहीं आता कि मीडिया में किस तरह की बातें उछल जाती है और वह फालतू की बातें करते रहते हैं. इस तरह कि बातें वह लोग करते हैं, जिनके अंदर ईष्या और जलन होती है. कुछ लोगों को हजम ही नहीं होता कि दो लोग एक साथ कैसे काम कर रहे हैं? जबकि हर कोई तसल्ली के साथ अपनी फिल्म बनाना चाहता है. कुछ लोग बांट कर काम करना पसंद नहीं करते. हम लोग तो शुरू से ही बांट कर काम करते आए हैं.

आपकी कुछ फिल्में लगातार असफल हुई, जिसके बाद आपके करियर को काफी धक्का लगा?

किसने कहा.. फिल्मों की सफलता या असफलता पर मैं कभी नहीं सोचता. देखिए‘ बौंबे वेल्वेट’ जैसी बड़े बजट की फिल्म के असफल होने पर मैंने सोचा कि मुझे कम बजट की अच्छी फिल्में बनाते रहना चाहिए.

आपने अपनी नई फिल्म का नाम ‘‘मुक्काबाज’’ क्यों रखा?

आपने सही पकड़ा. ‘मुक्काबाज’ तो एक गाली है. पर आपके इस सवाल का जवाब आपको फिल्म देखने पर जरुर मिलेगा. यदि आपने फिल्म का ट्रेलर देखा है तो ट्रेलर में यह बात आयी है कि, ‘आपको मुक्केबाज बनना है या मुक्काबाज बनना है. मुक्काबाज यानी की अपनी ताकत या हैसियत के आधार पर दूसरों को दबाने वाला. यह मानकर चलें कि हमारी इस फिल्म की कहानी किसी मुक्केबाज/बाक्सर की नहीं हैं. यदि ऐसा होता, तो हम फिल्म का नाम बौक्सर रखते.

सरस सलिल विशेष

फिल्म‘‘मुक्काबाज’’क्या है?

यह बौक्सिंग के खेल पर एक प्रेम कहानी प्रधान फिल्म है. इसमें हमने किसी एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि रिसर्च करके कई खिलाड़ियों की कहानी को समाहित किया है. हमारे यहां सिस्टम एक अच्छा खिलाड़ी पैदा ही नहीं करता है. जो भी खिलाड़ी उभरे हैं, वह निजी पैशन के चलते ही उभरे हैं. तो मैने उस प्रोसेस को फिल्म में हाई लाइट किया है. इसमें नेपोटिजम और जातिवाद का भी जिक्र है. मगर यह फिल्म किसी एक राजनीतिक पार्टी को लेकर नहीं,  बल्कि पूरे समाज को लेकर है. हमारी फिल्म की कहानी उस बौक्सर की है, जिसे भारत के लिए खेलने का मौका हीं नहीं मिला. इसलिए वह गरीब बच्चों को बौक्सिंग सिखाता है. यह फिल्म कई बाक्सरों/मुक्केबाजों की कहानी है. किनारे पर खड़े उन तमाम खिलाडिय़ों की कहानी है, जिनका भविष्य नौकरशाहों के हाथों में है.

स्पोर्ट्स को लेकर सिस्टम की क्या भागीदारी होनी चाहिए?

देखिए, मैं अभी सब कुछ बता दूंगा, तो कैसे चलेगा, मैं चाहता हूं कि आप लोग फिल्म देंखें. उसके बाद सवाल करें? हमारे यहां उंगली उठाने की बहुत जल्दबाजी रहती है. पर हम यह समझने की कोशिश कभी नहीं करते कि यदि यह चीज नही हो रही है, तो उसकी क्या वजह हैं? हम फिल्मकार हैं.

स्पोर्ट्स के क्षेत्र में दो लोगों ने मैडल जीता, तो हमने तुरंत उन दोनों पर बायोपिक फिल्म बना दी. मीडिया को लगता है कि यह बायोपिक का सीजन है. इसलिए मीडिया हर किसी से बायोपिक को लेकर सवाल कर रही है? मीडिया जब खिलाड़ी से इंटरव्यू करती है, तो उससे पूछती है कि यदि आप के उपर कोई बायोपिक फिल्म बने, तो आप किस कलाकार को चाहेंगे कि वह आपका किरदार फिल्म में निभाए? जबकि बायोपिक बनने का कोई मसला है ही नहीं. पर जब मीडिया ने सवाल पूछा, तो उस खिलाड़ी को लगता है कि वह बहुत बड़ा हीरो हो गया है. हर कोई अपने आपको हीरो समझने लगा है. ऐसे में सफल खिलाड़ी सीधे कह देते हैं कि सिनेमा के परदे पर उनके किरदार को सलमान खान, आमिर खान या शाहरूख खान निभाएं. हकीकत में हमारे यहां माहौल ऐसा हो गया है कि कोई किसी भी चीज को यथार्थ से देखता ही नहीं है.

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यानी कि आपको लगता है कि मैरी कौम’’सहित जो 2-3 बायोपिक फिल्में बनी हैं,वह यथार्थ से दूर हैं?

देखिए, बहुत सी चीजें इन फिल्मों में यथार्थ से परे भी होती हैं. इसकी वजह यह है कि हम फिल्मों में सब कुछ इतना अधिक सेलीब्रेट करते हैं, इतना सब कुछ अच्छा दिखा देते हैं कि हम असली चीजों को नजरंदाज कर देते हैं. हम बायोपिक फिल्म बनाते समय खामियों को उकेरते ही नहीं हैं. उनकी चर्चा ही नही करते. सिर्फ सेलीब्रेट करते हैं. हमारा देश सेलीब्रेशन में यकीन करता है. हम लोग सेलीब्रेट करने में इतना मशगूल हैं कि हमें जो बात कहनी चाहिए, वह हम भूल गए हैं. यदि हमारी फिल्मों के हिसाब से जाया जाए, तो इंसान को पैदा होते ही हीरो बन जाना चाहिए. यानी कि हमारी फिल्में इंसान की पूरी यात्रा खत्म कर देती हैं. हमने कभी इस बात पर फिल्मों में गौर नही किया कि हमारे यहां बौक्सर कहां से आते हैं? खिलाड़ी कहां से आते हैं? यह सब मिडल या निचले तबके से आते हैं. कोई भी बौक्सर या खिलाड़ी अमीर घरों या हाईफाई सोसायटी से नहीं आते.

निचले या मध्यमवर्गीय परिवारों से खिलाड़ियों के आने की वजहें क्या हैं?

इसी मुद्दे को मैंने फिल्म ‘‘मुक्काबाज’’में उठाया है. हमारी मीडिया बाहर जाकर इस बारे में जांच पड़ताल नही करती. लोग जानना ही नही चाहते कि एक फुटबौलर कहां से आता है? रोनाल्डो कहां से आया? रोनाल्डो भी स्लम से आया. हमारे जो दुनिया भर के रैप आर्टिस्ट हैं,  वह भी स्लम से ही आते हैं. यह सभी लोग संघर्ष करते हैं, अपनी हैसियत बढ़ाने के लिए और फिर किसी न किसी क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं. हमारे यहां लोग क्रिकेट के बाद फुटबौल के दीवाने हैं. पर वह यह नहीं जानते होंगे कि फुटबौल का जन्म ही हैसियत बढ़ाने के लिए हुआ था. पेले भी निचले तबके से आया था. आज लोग सचिन तेंदुलकर को सर्वसुविधा संपन्न देख रहे हैं. पर वह भी मध्यमवर्गीय परिवार से है. लोग सचिन तेंदुलकर की जड़ कहां है, इस पर गौर नही करते हैं. उसकी क्या यात्रा रही? यह कोई नही जानना चाहता है.

पर जो सर्वसुविधा सम्पन्न होते हैं, उन्हें किसी चीज की चाहत नहीं होती है. इसलिए वह आगे नहीं आते?

आपने बिलकुल सही बात पकड़ी. लेकिन हमारा सिस्टम ऐसे ही लोगों को पालता है. उन्हें ही आगे बढ़ाता है. सिस्टम उन्हें एक्सप्लौइट करता है. यह पूरा ताकत का खेल हो जाता है. यह सारा काम रिसर्च का है, जो कि मीडिया को करना चाहिए. सिनेमा या फिल्मकार का काम रिसर्च करना नहीं है. यह एक अलग बात है कि फिल्मकार अपनी फिल्म को सत्य के नजदीक लाने के लिए रिसर्च करता है. एक फिल्मकार को अपनी फिल्म के विषय से संबंधित जानकारी अखबार से पता चलनी चाहिए, पर ऐसा नही होता. हमारे अखबार क्रिकेट को दो पन्ने देते हैं, किंतु दूसरे खेलों को वह तव्वजों नहीं देते. समस्या हर तबके में और हर व्यापार में है. इससे मीडिया अछूता नही है. हमारी फिल्म में एक संवाद हैं- ‘‘किसी खिलाड़ी पर पिक्चर बनाओ, तो 40 करोड़ कमा लेगी, पर टुर्नामेंट देखने के लिए 40 लोग नही आते. ’’सभी टुर्नामेंट के स्टेडियम खाली होते है. जबसे पीवी सिंधू चर्चा में आयी हैं और मैडल जीते हैं, तब से बैडमिंटन के टुर्नामेंट के स्टेडियम भरने लगे हैं. आप प्रकाश पादुकोण से पूछिए कि वह किन हालातों में बैडमिंटन खेलते थे.

हमारे देश में सिनेमा और क्रिकेट को बिकाउ माना जाता है?

हकीकत में सिनेमा और क्रिकेट दो ऐसे साफ्ट कौर्नर हैं, जिन्हें हर कोई एक्सप्लौइट करता है. उन्हें ही बेचा जाता है. पर अब आप खुद बताएं कि अब बैडमिंटन कैसे बिकने लगा?  सीधी सी बात है. जब कोई खिलाड़ी अपनी मेहनत, लगन, परिश्रम के बल पर कहीं चमक जाता है, तो सबको उसके बारे में, उसके खेल के बारे में पता चल जाता है. पर मीडिया का काम होता है कि वह खिलाड़ियों को चमकाएं. उनके बारे में बात करे. मगर मीडिया अपने इस कर्म को अंजाम ही नहीं देता. अखबार का संपादक तय करता है कि वह किसे अपने अखबार के पहले पेज पर कितनी बड़ी जगह देगा. आज का संपादक जो बिकता है, उसको उपर बहुत बड़ी जगह पर लगाता है, जो नहीं बिकता है, उसे कोने में डाल देता है. क्योंकि सब कुछ बाजार के आधीन हो रहा है.

आपने मुक्काबाजबनाने से पहले किस तरह कि रिसर्च की और क्या पाया?

मैं फिल्म के प्रदर्शन से पहले इन चीजों पर बात नही करना चाहता. मैं अपनी बात को फिल्म के माध्यम से कहना चाहता हूं. मैंने सारा रिसर्च वीडियो रिकौर्डिंग के साथ किया है. इन वीडियो रिकौर्डिंग से हमें पता चला की सिस्टम किस तरह से खिलाड़ियों को परेशान करता है.

आप खुद दिल्ली में जाकर देखिए. खेल गांव बनाया गया था. पर क्या वहां पर खेल के मैदान पर खेल होते हैं? मीडिया को जाकर देखना चाहिए कि खेल के मैदानों की क्या स्थिति है? बिहार में भी बहुत बड़ा स्टेडियम बनाया गया. रांची में बनाया गया. मगर इन स्टेडियम को खेल के लिए नहीं बल्कि प्रवचन के लिए, भाषण बाजी के लिए, कन्वोकेशन के लिए किराए पर दिया जाता है. आप पैसे देकर इन मैदान में खेलने जा सकते हैं, अन्यथा नहीं. हम विदेश जाते हैं, और यदि हमें कोई खेल खेलना हो या स्वीमिंग करना हो, तो गूगल सर्च करने पर हम जिस जगह खड़े होते हैं, वहां से 5 मिनट की दूरी पर सुविधाएं मिल जाती हैं. भारत में यह सब संभव नही है. वहां आप किसी को भी नहीं जानते, तो भी खेल के मैदान में घुस सकते हैं. पर भारत में बिना जान पहचान के आप खेल के मैदान में नहीं जा सकते. हमारे देश में ऐसे लोग नही हैं, जो कि असली खिलाड़ी को पहचान कर उसे उठाने का काम करें. सरकार में बैठे लोग अपने किसी मंत्री या रिश्तेदार के लड़के को खेल में आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं, भले ही उसे खेलना ना आता हो.

मगर अभिषेक बच्चन सहित कुछ फिल्म कलाकारों ने कबड्डी व कुछ अन्य खेलों को आगे बढ़ाने के लिए टीमें खरीदी. प्रतियोगिताएं की. इसके बावजूद कबड्डी या दूसरे खेल लोकप्रिय क्यों नहीं हुए?

यह सभी लोग मार्केटिंग कर रहे हैं, खेल को बेच रहे हैं. खेल को लोकप्रियता तभी मिलती है, जब उसे एक सही प्लेटफार्म मिलता है. यहां पर प्लेटफार्म दिया नहीं जाता. हमारे यहां कोई बौक्सर ही नही है. हमारे यहां बेचारा सही खिलाड़ी सायकल पर घूमता रहता है.

एक खिलाड़ी को सिस्टम की जरूरत क्यों पड़नी चाहिए?

हर खिलाड़ी को सिस्टम की जरूरत पड़नी चाहिए और पड़ती है. सिस्टम इसीलिए है. हम सरकार चुनते है, जिससे वह हमें सुख सुविधा उपलब्ध कराए. हम जिस सरकार को चुनते हैं, उसकी हमारे प्रति कुछ जिम्मेदारियां है. हकीकत में हमारे देश में हम स्पोर्ट्स की इज्जत ही नहीं करते हैं. मुझे एक ऐसा आदमी बताइए,  जो स्पोर्ट्स से ना जुड़ा हो और उसे स्पोर्ट्स के बारे में जानकारी हो.

हमारी सायकोलौजी बचपन से ही सरकारी नौकरी ढूंढ़ने की होती है. हम सोचते हैं कि आईएएस या आईपीएस बन जाएं, हमारी सरकारी नौकरी लग जाए और हमारी जिंदगी सकून से बीत जाएगी.

यह हालात स्पोर्ट्स को लेकर भी है. निचले या मध्यम वर्गीय परिवार से जुड़े लोग सरकारी नौकरी पाने की इच्छा के तहत स्पोर्ट्स को पार्ट कट मानकर स्पोर्ट्स से जुड़ते हैं.

यदि मैं लोगों कि सोच के हिसाब से चलूंगा, तो कभी कुछ नहीं हो पाएगा. कम से कम मैं तो लोगों की सोच के हिसाब से काम नहीं करता. देखिए, मीडिया का काम गौसिप सुनकर सवाल पूछना नहीं, बल्कि शोध करने के बाद सवाल करना है. हमें सोचना यह होगा कि हम लोगों की सोच को कैसे बदलें? जिस पर हम सोचते ही नहीं है.

हमारे देश में जिस तरह से फिल्म का प्रमोशन होता है, उस तरह से मैं प्रमोशन नहीं करता. क्योंकि इस तरह के प्रमोशन में मीडिया बिना फिल्म देखे सवाल करती है. मैंने अपनी फिल्म ‘‘मुक्काबाज’’में एक ही सवाल उठाया है कि हमारा देश जनसंख्या के मामले में चीन के बाद दूसरे नंबर पर है, इसके बावजूद हम ओलपिंक खेलों में दो से ज्यादा मैडल क्यों नहीं ला पाते. इस सवाल में सारे मुद्दे आ जाते हैं. वह सारी बातें आ गयीं, जिन पर हर भारतीय को सोचना चाहिए. अब आपको जवाब चाहिए, तो आप फिल्म देंखे. फिर सोचिए. मेरा काम है इंसान का ध्यान उस तरफ ले जाना. फिर जिसे उस बात से परेशानी हुई हो वह सवाल करे.

इन दिनों सिनेमा के विकास के नाम पर हर राज्य सरकार सब्सिडी दे रही है. क्या इससे सिनेमा को फायदा हो रहा है?

सरकार की सब्सिडी योजना के ही चलते सिनेमा में काफी काम हो रहा है. अब सामाजिक राजनैतिक सिनेमा बनने लगा है. हमारी फिल्म ‘मसान’ के बाद अब ‘मुक्काबाज’ को भी उत्तर प्रदेश सरकार की ‘फिल्म बंधु’’ से आर्थिक मदद मिली है. इस तरह की मदद से हम बेहतर सिनेमा बनाते हैं. सरकारों को ऐसा करना भी चाहिए. आप दूसरे देशों में जाइए, वहां हमारे देश के मुकाबले अधिक सुविधाएं मिलती हैं. हिंदी तमिल, मलयालम और तेलगू को सुविधाएं कम मिलती हैं, क्योंकि इन भाषाओं के सिनेमा के दर्शक काफी हैं. मैं हर राज्य के बारे में नहीं जानता, पर उत्तर प्रदेश में फिल्म बंधू बहुत अच्छे ढंग से काम कर रहा है.

हर सरकार को यह समझना चाहिए कि सिनेमा हमारे राज्य या देश का ‘कल्चरल अम्बेसेडर’/‘सांस्कृतिक दूत’है. जो देश इस बात को समझ गया, वह तरक्की कर रहा है. आप खुद सोचिए कि भारतीय फिल्म ‘‘जिदंगी ना मिलेगी दोबारा’’ को स्पेन में फिल्माया जा रहा था, तो फिल्म के सेट पर स्पेन के राजा ने आकर फिल्मकार व कलाकारों का सम्मान किया था. वह जानते है कि सिनेमा की वजह से उस देश को टूरिज्म मिलता है. लोग सिनेमा के माध्यम से उस देश की सभ्यता, संस्कृति व घूमने वाली जगहों के बारे में जान पाते हैं.

आपकी राय में भारत में सिनेमा को तवज्जों नहीं दी जा रही है. यदि ऐसा है, तो इसकी वजहें क्या है?

आपको यह सवाल सरकार से पूछना चाहिए. मेरा काम सिर्फ सिनेमा बनाना है.

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फिल्मकार के रूप में क्या सवाल उठाना ही आपका काम है,उसका हल बताना नहीं?

जी हां! फिल्मकार के तौर पर मेरा काम समाज व देश में जो कुछ हो रहा है, उसका आइना सिनेमा के माध्यम से दिखाना मात्र है. फिल्मकार के तौर पर उन सवालों को उठाना है, जिन्हें कोई पूछ नहीं रहा है. सवालों का जवाब ढूंढ़ना मेरा काम नहीं है. एक वक्त वह था, जब हमारे यहां ‘सुजाता’ व ‘बंदिनी’जैसा सिनेमा बनता था. हम इसी तरह के सिनेमा को देखकर बड़े हुए हैं. मगर अब इस तरह का सिनेमा क्यों नहीं बनता?

आप फिल्मकार हैं, तो आपने सोचा होगा कि इस तरह का सिनेमा क्यों नही बन रहा है?

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मीडिया की यही समस्या है. मीडिया मेन स्ट्रीम सिनेमा के फिल्मकारो से कभी नहीं पूछता कि वह सामाजिक फिल्में क्यों नहीं बना रहा? हम जैसे लोग जो कि नए तरह का सिनेमा बना रहे हैं, उन्ही से पूछते हैं कि हम यह क्यों बना रहे हैं? क्या कभी मीडिया ने मेनस्ट्रीम सिनेमा बनाने वालों से सवाल किया कि आप लोग हमारे समाज में जो कुछ हो रहा है, उस पर फिल्में क्यों नहीं बनाते?

आपने यह कैसे सोच लिया कि मैंने या दूसरे पत्रकार ने मेनस्ट्रीम सिनेमा बनाने वालों से सवाल नहीं किया होगा?

इसकी वजह यह है कि मैंने आज तक इस तरह के सवाल पढ़े नहीं है. आप लोगों को चाहिए कि मेन स्ट्रीम सिनेमा बनाने वालों से पूछिए कि वह अपना हिंदी सिनेमा लंदन या जापान में जाकर क्यों फिल्माते हैं? आखिर हमारे अपने देश में लंदन, फ्रांस, पेरिस या स्पेन कहां है? मीडिया ने कभी किसी दर्शक से नहीं पूछा कि भारत में रहते हुए आप वह सिनेमा क्यों देखते हैं, जो लंदन या स्पेन में फिल्माया जाता है.

आप खुद मराठी भाषा की फिल्म का निर्माण कर चुके हैं. आपके अनुसार मराठी सिनेमा कितनी प्रगति कर रहा हैं?

मराठी सिनेमा प्रगति कर रहा था. अच्छी मराठी फिल्में बन रही थीं. अब क्या स्थिति है, पता नहीं. जब कोई मूवमेंट शुरू होता है, तो अच्छा लगता है, अच्छा काम होता है. फिर लोग उसका दुरूपयोग करने लगते हैं. जैसे कि जब सोशल मीडिया का प्रादुर्भाव हुआ था, तो काफी अच्छा था. अब यह गलत राह पर है. मराठी सिनेमा को जब महाराष्ट्र सरकार से सब्सिडी मिलनी शुरू हुई, तो लोगों ने अच्छा सिनेमा बनाया. पर बाद में लोगों ने महज सब्सिडी हासिल करने के लिए सिनेमा बनाना शुरू कर दिया.

आप कहते हैं कि सोशल मीडिया गलत राह पर है, मगर आप खुद सोशल मीडिया पर काफी व्यस्त रहते हैं?

मैं किसी को फौलो नहीं करता. मैं अपनी बात कह देता हूं. बस..सोशल मीडिया पर कुछ भी पढ़ता ही नहीं. शुरू में सही ही था उपयोगी था. अब सोशल मीडिया में सबसे अधिक गौसिप होने लगा है. पता ही नहीं चलता कि सच क्या है. मीडिया भी सोशल मीडिया की खबरें उठाकर बिना सच जाने छापने लगा है. मैंने एक अखबार को इंटरव्यू दिया, वही इंटरव्यू कई अखबार में छपा हुआ मिलता है. मजेदार बात यह है कि धीर धीरे उस इंटरव्यू में कई चीजें उलटफेर होती जाती हैं. पत्रकार अब नई हेडलाइन के चक्कर में रहता है. मैं जिन पत्रकारो से नियमित मिलता हूं, वह भी यही कर रहे हैं. अब पत्रकारिता काफी बदल गयी है. अब हर इंसान को एक आसान सी जिंदगी चाहिए. सब कुछ अर्थ के अधीन है. मोबाइल कंपनियां अपने सिस्टम से एक साल बाद आपके मोबाइल को खराब कर देती हैं, जिससे आप उनका नया मोबाइल खरीदें. अब गारंटी नहीं, वारंटी मिलती है. अब मुझे आपका पैसा चाहिए, तो मुझे आपको कुछ बेचना पड़ेगा. इसलिए जरुरत पैदा की जाती है. अब लोगो को सच नहीं बताया जाता.

क्या यह सब शिक्षा की कमी का असर है?

यह सब शिक्षा की कमी के अलावा लोगों को बर्गला कर किया जाता है.